मैं नर्मदा हूं। मैं बताती हूँ अपनी आप बीती…….

मैं नर्मदा हूं। मैं बयां करूंगी अपनी आप बीती.......
मैं नर्मदा हूं। मैं बयां करूंगी अपनी आप बीती.......

मैं नर्मदा हूं। मैं बताती हूँ अपनी आप बीती…….

 

दिनेश गुप्ता –

मैं नर्मदा हूं। मध्यप्रदेश का अमरकंटक मेरा उद्गम स्थल है। इस स्थल पर मेरी उत्पत्ति को लेकर शास्त्रों एवं पुराणों में कई तरह की कहानियां हैं। मैं आज अपनी कहानी खुद बयां करना चाहती हूं। इस कहानी में पुण्य सलिला भी हूं और पीड़िता भी। मेरे तट पर आने वाले लाखों लोगों को अपनी कहानी सुनाने की कोशिश की है, लेकिन मेरी कहानी सुनने का वक्त किसी को मिला ही नहीं। एक प्रतापी राजा जिन्हें आज के दौर में मुख्यमंत्री कहा जाता है। मेरे ही तट पर मेरी गोद खेलकर बड़े हुए मैंने उन्हें भी कहानी सुनाने की कोशिश की। मेरी कलकल करती ध्वनि में छुपी वेदना शायद वे सुन नहीं पाए। मैंने अब अपने आपको नियति के हाथों सौंप दिया है। जिस कार्य के लिए मुझे मृत्यु लोक में लाया गया, उसे पूरा करना मेरा धर्म भी है और नियति भी है।
मैं अपना दु:ख उस वक्त भूल जाती हूं, जब लोग

मैं नर्मदा हूं। मैं बयां करूंगी अपनी आप बीती.......

मुझे मां के संबोधन से बुलाते हैं। मां का धर्म ही संतान की रक्षा करना है, उसका पालन पोषण करना है। लेकिन संतान का धर्म क्या है? मां के आंचल को छलनी करना? पहले मेरे प्रवाह को बांध बनाकर रोका गया और अब उस रेत को मेरे आंचल से नोच खसोट कर निकाला जा रहा है। किसी भी नदी के लिए रेत का सृजन श्रम साध्य काम होता है। पहाड़ों को चीरती हुई जब एक नदी अपने पूर्ण वेग के साथ बहती है तो वह कुछ रेत अपने आंचल में समेट लेती है।

इस रेत के बदले पर्वत राजा से मैं वादा करती हूं कि मैं इसका उपयोग जल निर्मलता और शीतलता को बनाने के लिए करूंगी। पहाड़, पर्वत खुशी-खुशी मुझे अपने अंश सौंप देते हैं। न जाने कितने मासूमों को अपने तट पर इस रेत से घरघूला बनाते देखा है। कितना संतोष मिलता था। लेकिन, आज तो इंसान ने मेरे तटों पर पड़ी रेत का ही नहीं मेरे गर्भ में छिपी रेत का भी सौदा कर लिया है। रेत के सौदे के कारण मेरी पहचान भी खंडित होती जा रही है। अरे, मैं अपनी कहानी बताना तो भूल ही गई। पीढ़ा ही कुछ ऐसी है। आज की तकलीफें गुजरे कल की मधुर और गौरवशाली यादों को भी मिटा देती हैं।

मैं अपनी आप बीती आगे बयां करूंगी। अभी तो मैं बात अपनी उत्पत्ति, अपने बहाव और अपने पौराणिक महत्व की बताना चाहती हूं। मेरे बारे में स्कन्द पुराण में पूरा एक अध्याय रेवाखंड के नाम से आज की फेसबुक की पीढ़ी के लिए स्कन्द पुराण कोई महत्व नहीं रखता है। उनके लिए मैं सिर्फ एक पर्यटन और मनोरंजन का जरिया ही हूं।

आज की पीढ़ी के मनोरंजन के लिए राजाओं ने कई वैभवशाली अटटालिकाओं का निर्माण मेरे तटों पर कर दिया है। इन तटों पर लोग जलक्रीड़ा करते हैं तो मुझे खुशी होती है। जाने-अनजाने वे अपने पापों का शमन ही तो करते हैं। दुख तो जब होता है जब वे मुझे प्रदूषित करने में भी नहीं हिचकते। मेरा अवतरण ही पापों के शमन के लिए हुआ है। पुराणों में कहा गया है कि मेरे दर्शन मात्र से ही लोगों के जन्म जन्मातर के पापों का नाश हो जाता है। पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है। मेरे अवतरण की पहली कथा चंद्रवंश के पुरूरवा नाम के राजा से जुड़ी हुई है।

उनकी इच्छा स्वर्ग लोक जाने की थी। उन्हें जब मेरे बारे में ज्ञात हुआ तो वे महादेव की आराधना में रत हो गए। महादेवजी ने प्रसन्न होकर जब उनसे वरदान मांगने के लिए कहा तो राजा पुरूरवा ने मुझे पृथ्वी पर उतारने की इच्छा प्रकट कर दी। महादेवजी उन्हें कई तरह के प्रलोभन दिए, लेकिन राजा जिद पर अड़े रहे। महादेवजी ने हार कर मुझे पृथ्वी लोक जाने का आदेश दिया। मेरे सामने समस्या यह थी कि मैं बिना किसी आधार के मृत्यु लोग में अवतरित नहीं हो सकती थी। मैंने अपनी मजबूरी महादेव के सामने रखी तो उन्होंने आठ पर्वतों को बुलाया और सभी से पूछा कि नर्मदा को कौन धारण करने में समर्थ है। विंध्यगिरी ने अपने पुत्र पर्यंक का नाम सुझाया। महादेव के आदेश पर पर्यंक मुझे धारण करने को राजी हो गए। तंदतर मैं पर्यंक गिरी के शिखर पर स्थित होकर उतरी। मेरा प्रवाह इतना तेज था कि पर्वत, जंगल सभी जल में डूब गए। संपूर्ण जगत प्रलयकाल से ग्रस्त हो गया। देवताओं ने मेरी स्तुति की और आग्रह किया कि कल्याणी मर्यादा धारण करो। नियत सीमा में स्थित रहो और विश्व की हितकारिणी बनो। देवताओं के इस आग्रह का पालन युगों-युगों बाद मैं आज भी कर रही हूं।
एक अन्य कहानी हिरण्यतेजा नाम से प्रसिद्ध राजश्री से जुड़ी हुई है। उनकी तपस्या के बाद महादेवजी ने मुझे उदयाचल पर्वत के आधार से पृथ्वी पर •ोजा। पर्वत मेरा आधार हैं और इनकी रक्षा मेरा धर्म है। पर्वत हर रोज अपना कुछ अंश रेत के रूप में मुझे देते हैं।

 

शास्त्रों और पुराणों में मुझे चिरकुंआरी भी कहा गया है। कई कहानियां भी हैं। मैं उन कहानियों को आगे बताऊंगी। इससे पहले मैं स्कन्द पुराण में उल्लेखित पुरूकुत्सु की कथा बताना जरूरी समझती हूं। पुरूकुत्सु ने भी पृथ्वी पर मुझे लाने के लिए कठोर तपस्या की।

 

पुरूकुत्सु की तपस्या के बाद पर्यंक पर्वत ने मुझे धारण कर पृथ्वी पर •ोजा। मैं वहां पहुंची जहां पूर्वकाल में राजा पृथुने अश्वमेघ यज्ञ किया था। वहीं एक बांस के मूल भाग से मैं निकली। उस समय सभी देवता गंर्धव यक्ष, मरूत, अश्विनी कुमार के साथ राक्षस, नाग और तपोधन ऋषि सभी अर्ध्य और पाद्य से पूजन कर मेरी शरण को प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि हम उसी को पुरुष मानते हैं जिसने आपको यहां उतारा है।

नर्मदे तुम अपने हाथों से देवताओं का स्पर्श करो, जिससे सब लोग पवित्र हो जाएं। मैं हतप्रद थीं। मैंने कहा मैं अब तक कुंआरी हूं, मेरा पति नहीं है। अत: मैं देवगणों का स्पर्श नहीं कर सकती। देवता चिंतित और व्याकुल हो उठे और बोले देवी तुम्हारे समान रूपगुण से संपन्न उत्तम वर कहां से प्राप्त हो सकता है।

जिसने तुम्हें इस लोक में प्रकट किया है वही तुम्हारा पति हो। पूर्वकाल में ब्रम्हाा जी के हिसाब से समुद्र मृत्यु लोक में आकर राजा पुरुकुत्सु के रूप में उत्पन्न हुआ है। वह देवतुल्य क्षत्रिय पुरूष तुम्हारे लिए श्रेष्ठ वर है। देव ऋषियों का यह आदेश पाकर मैंने कहा कि जिनमें इस प्रकार का देवतत्व है, जिनकी समस्त प्रजा धर्म में स्थित है उन महात्मा पुरूकुत्सु के लिए और क्या कहा जा सकता है। स्वयंभू ब्रम्हाा जी मानस पुत्र जिस प्रकार से धर्मनिष्ठ बताए गए हैं उसी प्रकार यह पुरूकुत्सु भी सब धर्मों के पालन में तत्पर हैं। मैंने उन्हें पति के रूप में स्वीकार कर लिया है।

 

पुरूकुत्सु ने मुझसे ऐसी कृपा करने के लिए कहा जिनसे उनके पितर स्वर्ग को जाएं और उन्हें महान यश हो। मैंने उन्हें वचन दिया और पर्यंक पर्वत से निकलकर पश्चिमी दिशा की ओर चली गई। मेरी गति तीर की तरह थी। पृथ्वी को विद्रीण करती और पर्वत शिखरों को तोड़ती-फोड़ती हुई मैं वेग से चली जा रही थी। उस समय विंध्य पर्वत के प्रदेश में जहां-जहां मैं गर्इं वहां-वहां स्रान करने पर सहस्त्रों गंगा स्रान का फल प्राप्त होता है।

मैं भारत की पांचवी सबसे बड़ी नदी हूं। जिसकी कुल लम्बाई 1312 किलोमीटर है। मेरा उद्गम स्थल अमरकंटक मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में मेकल पर्वत मालाओं में बसा हुआ है। अमरकंटक की समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 900 मीटर है। मेरा मार्ग अनूपपुर जिले से शुरू होकर डिंडौरी, मंडला, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, सीहोर, हरदा, खंडवा, खरगौन और बड़वानी जिले से बहती हुई महाराष्टÑ की सीमा में प्रवेश कर जाता है।

मध्यप्रदेश में मेरा सफर 1077 किलोमीटर का होता है। 35 किलोमीटर मध्यप्रदेश और महाराष्टÑ की सीमा में तथा 39 किमी महाराष्टÑ और गुजरात की सीमा में बहती हूं। इसके बाद 161 किमी गुजरात के नर्मदा और भरूच जिले से बहती हुई खंबात की खाड़ी में जाकर समाहित हो जाती हूं। मेरी सैकड़ों सहायक नदियां हैं, लेकिन 41 नदियां ऐसी हैं जिनका जलग्रहण क्षेत्र 500 वर्ग किलोमीटर से अधिक होने के कारण मेरा आकार बढ़ जाता है।

19 सहायक नदियां दाएं तट से तथा 22 नदियां बाएं तट से आकर मुझसे मिलती हैं। इन सारी नदियों से मेरा मिलन मध्यप्रदेश में होता है। गुजरात तो सिर्फ दो नदियां ही आकर मुझसे मिलती हैं।
मेरी जल क्षमता का आंकलन किया जाना संभव नहीं है। मेरी जल क्षमता का उपयोग हर वो राज्य करना चाहता था, जहां से मैं गुजरती थी। मुुझे 19वीं सदी के अंत के दिन अच्छे से याद हैं। मेरे प्रवाह को बांध बनाकर रोकने का विचार इसी सदी में आया था। देश आजाद नहीं हुआ था।

अंग्रेज हुकमरान थे। मेरे प्रवाह क्षेत्र में भी शासक अलग-अलग थे। देश के पहले सिंचाई आयोग ने 1901 में अपनी रिपोर्ट पेश की और भरूच के पास बैराज बनाने की आवश्यकता का उल्लेख किया। आजादी के कुछ माह पूर्व तत्कालीन बंबई राज के सीपी एंड बरार ने अनुरोध किया कि बाढ़ नियंत्रण, नौपरिवहन, सिंचाई और जल विद्युत विकास के लिए मेरा उपयोग किए जाने पर अनुसंधान किया जाना चाहिए।

आजादी के बाद सर्वेक्षण कर सहमति बनी। पहले प्रधानमंत्री की आधुनिक सोच और चिंतन बड़े बांधों के निर्माण का था। 1956 में भरूच परियोजना के स्थल का चयन हो गया। इस चयन के साथ ही मुझे बड़े बांधों के जरिए रोकने की शुरुआत भी हो गई। इसके बाद मेरे पानी के उपयोग को लेकर राज्यों के बीच विवाद शुरू हो गया। 1963 में भरूच परियोजना के बांध की ऊंचाई 425 फीट रखने का सुझाव आया था।

मध्यप्रदेश में इंदिरा सागर बांध पर बिजली परियोजना शुरू करने पर सहमति बनी। इसमें महाराष्टÑ और गुजरात की हिस्सेदारी भी तय हुई। सबसे ज्यादा विवाद मेरी ऊंचाई को लेकर हुआ। मेरी ऊंचाई से ही यह तय होना था कि कितने लोग विस्थापित होेंगे। न जाने कितने एकड़ उपजाऊ जमीन बांधों के कारण उपज देने के लिए नहीं बचेगी।
ओंकारेश्वर, महेश्वर और न जाने कितनी परियोजनाओं के जरिए मुझे बांधा गया। मैंने कभी भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। मैं देव आदेश से बंधी हुई थी। अब मुझे बांधों के जरिए रोक दिया गया है। मैं खामोश हूं, मेरी खामोशी में छुपा दर्द शायद ही कोई समझ पाए। मेरी स्थिति अब वो नहीं बची है, जिस रूप में मैं इस धरा पर अवतरित हुई थी।

बांध के नीचे एक पाताल नगरी होती है। बिजली बनाने वाले टरवाइन यहां होते हैं। बांधों की उपयोगिता तब ही है, जब भरपूर बारिश हो। पर्यावरण को हो रहे लगातार नुकसान के कारण हर साल औसत बारिश में कमी आती जा रही है। बारिश नहीं होगी तो मेरा अस्तित्व भी नहीं होगा। स•यता के आगमन के साथ-साथ अन्य नदियों की तरह मेरी सुंदरता और पवित्रता भी खंडित हुई है। पहले जब बारिश होती थी तो मैं तट बंधों को भी पार कर जाती थी।

 

अब मेरी धार पतली हो गई है। मेरा संरक्षण नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब मेरी एक-एक बूंद के लिए लोग मरने मारने पर उतारू हो जाएंगे। मैंने सुना है कि मेरे उद्गम स्थल वाले राज्य मध्यप्रदेश के शासक शिवराज सिंह चौहान मेरे संरक्षण के बारे में गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

मैंने अपने ही तट पर हाल ही में आए कुछ महापुरुषों से यह भी सुना कि मेरी एक हजार किलोमीटर से अधिक की यात्रा के बीच 12 करोड़ पेड़ लगाने की योजना बनाई जा रही है। हर दो किलोमीटर पर पेड़ लगाए जाने हैं। नदियों का अस्तित्व तो पर्वतों और पेड़ों से रिसने वाले जल पर ही निर्भर है। मेरा रास्ता तो पर्वतों के बीच से होकर ही निकलता है। छोटे-बड़े, चौड़े-सकरे सभी तरह के रास्तों पर मैं मचलती, इठलाती चलती हूं। कई तरह के प्रपात भी हैं। सबसे बडेÞ प्रपात का पानी हरे रंग का होता है।

 

चट्टानों से मेरा संघर्ष निरंतर चलता रहता है। मेरे और चट्टानों के संघर्ष में कुछ चट्टाने शिवलिंग के आकार में टूटकर मुझमें समां जाती हैं। यह शिवलिंग नर्मदेश्वर शिवलिंग कहे जाते हैं। धावड़ी कुंड से निकलने वाले इस तरह के शिवलिंगों को प्राप्त करने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। मेरे सफर के हर मोड़ पर एक नई कहानी, नई संस्कृति और नई परम्परा देखने को मिलती है। जबलपुर के •ोड़ाघाट में जब मैं चट्टानों से टकराती हूं तो वे सफेद संगमरमरी होती हैं। लेकिन धावड़ी कुंड की चट्टाने संगमरमरी काली और सलेटी हैं।

 

महेश्वर में मेरा घाट सबसे सुंदर है। यह एक ऐतिहासिक नगरी है। यहां के लोगों का मुख्य व्यवसाय हथकरघा से साड़ियां बनाने का है। यहां बनने वाली साड़ियां महेश्वरी साड़ियों के नाम से पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुकी हैं। शायद यह मेरा ही असर है जिसके कारण महेश्वर की साड़ियों जैसी खुबसूरती बढ़ गई।

यहां की शासक अहिल्या बाई से मेरा संपर्क निरंतर रहा है। नजदीक ही ओंकारेश्वर नामक बड़ा तीर्थ मेरे तट पर बसा हुआ है। यहां भी बड़ी संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक ज्योर्तिलिंग यहां पर भी है। देवास जिले के नेमावर से भी मैं निकली हूं। यहां पर भी महाभारतकाल का एक प्राचीन मंदिर स्थापित है। इसकी महत्ता भी पुराणों में दर्शाई गई है।

 

होशंगाबाद, आंवलीघाट सहित कई प्रमुख स्थानों से भी होकर मैं गुजरी हैं। मैं एक ऐसी नदी हूं, जिसका लोग परिक्रमा करते हैं। मेरी परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और 13 दिन में करने का महत्व है। मेरी पंचक्रोशी यात्रा का भी पुराणोें में महत्व है। मेरी परिक्रमा करने वाले भक्तों की सेवा के लिए मेरे किनारों पर सदावरत भी चलता है। कई स्थानों पर मंदिर, रहने के लिए धर्मशालाएं बनाई गर्इं हैं, ताकि मेरे परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी नहीं हो।
सदियों से सदानीरा रहने के कारण मुझे ‘न मृता तेन नर्मदा’ कहा गया है। स्कन्द पुराण में ‘सप्त कल्पक्षयेक्षीणे न मृता तेन नर्मदा’ अर्थात सात कल्प क्षय होने पर भी नष्ट न होने वाली नर्मदा कहा गया है। मेरा जल-स्रोत वन हैं। वृक्ष नहीं होंगे तो वन नहीं होंगे और मैं नहीं बचूंगी।

मुझे जीवन-रेखा कहने के कारण मैं मध्यप्रदेश को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाती हूं। मैं पेयजल, सिंचाई और बिजली देती हूं। वर्ल्ड रिर्सोसेज इंस्टीटयूट, वाशिंगटन के अनेक नदी बेसिन में कराए गए अध्ययन ‘पायलट एनालिसिस आॅफ ग्लोबल इको सिस्टम’ में मुझे विश्व के सबसे ज्यादा संकटग्रस्त बेसिनों में से एक माना गया है, जिनमें साल के सबसे शुष्क 4 माह में वार्षिक प्रवाह का 2 प्रतिशत से भी कम रह जाता है।

 

यदि अभी से उपाय नहीं किए गए तो नदी बेसिन में रहने वालों को 2025 आते-आते जरूरी पानी की मात्रा भी कठिनाई से मिलेगी। भारत के जनगणना निदेशक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार मेरे अंचल के जिलों की कुल आबादी, जो वर्ष 1901 में 65.69 लाख और 2001 में 3.31 करोड़ थी, वह वर्ष 2026 में बढ़कर 4.81 करोड़ हो जाने का अनुमान है। मेरी गणना धरती की सबसे प्राचीन नदियों में होती है।

मेरी पर्वत श्रंखलाओं में करोड़ों वर्ष पुरानी वनस्पति और जंतुओं के जीवाश्म बड़ी संख्या में मिले हैं। करोड़ वर्ष के दौरान जैव-विविधता के यहां अनेक रूप समय-समय पर प्रकट हुए और विलुप्त हुए। लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में अनेक भूकंपों और भू-गर्भीय उथल-पुथल के कारण पृथ्वी की सतह पर पिघले हुए गर्म लावा की परतों ने झील और जलाशयों के बीच की वनस्पतियों को भू-चालिक राख से ढंक दिया था। लाखों वर्षों में पाषाणीकरण होने से वृक्षों के तने, फल-फूल, बीज, लताएं, पत्तियां सब ज्यों के त्यों कठोर होकर जीवाश्मों में बदल गए।
मेरी घाटी में पाए गए जंतु जीवाश्मों में हाथी, घोड़े, दरियाई घोड़ा, जंगली भैंसों के जीवाश्म के साथ सीहोर जिले के हथनौरा गांव में प्राचीन मानव के कपाल अवशेष भी मिले हैं। हथनौरा में मेरे तट पर खुदाई से प्राप्त मानव कपाल का नाम ‘नर्मदा कपाल’ रखा जाकर इस प्राचीन मानव को वैज्ञानिकों द्वारा नर्मदा मानव का नाम दिया गया है।

हथनौरा के पास ही ग्राम धांसी में उत्तरी तट पर प्राचीनतम विलुप्त हाथी (स्टेगोडॉन) के दोनों दांत तथा ऊपरी जबड़े का जीवाश्म मिले हैं। नरसिंहपुर के पास मेरे और शेर नदी के संगम के निकट भी प्राचीन पशुओं के अस्थि-जीवाश्म भारी मात्रा में मिले हैं। जबलपुर के पास स्टेगोसारस नामक विशालकाय डायनासोर के पीठ के एक कांटे और राजासारस डायनासोर के ऊपरी जबड़े का जीवाश्म मिला है।

धार जिले में कुक्षी के निकट लगभग 8 करोड़ साल पुराने सॉरोपोड डायनासोर के 104 अण्डे और दो बड़ी फीमर हड्डियां मिलीं। वैज्ञानिक सॉरोपोड का आकार 40 से 90 फीट मानते हैं। मेरे प्रवाह क्षेत्र जिसे नर्मदा घाटी भी कहा जाता है, में 1.7 अरब वर्ष से लेकर कुछ हजार साल पहले तक समुद्री, स्वच्छ जलीय एवं थलीय वनस्पतियां, समुद्री सीपी-शंख, जमीनी कीड़े-मकोड़ों से लेकर दैत्याकार डायनासोरों तक के जीवाश्म मिले हैं।

यहां शार्क मछलियों के 5000 से अधिक दंत जीवाश्म भी पाए गए हैं। इन तथ्यों का जिक्र मैंने इसलिए किया है, ताकि आपको यह पता लग सके कि मेरी प्राचीनता का इतिहास कितना पुराना है। स•यता और विकास के साथ डायनासोर भी लुप्त हो गया और दरियाई घोड़े तो अब सिर्फ किस्सों में ही सुनाई देते हैं।
मेरी उत्पत्ति की कहानी तो मैंने आपको सुनाई ही दी है। भगवान शिव की कृपा के चलते ही मेरे गर्भ में छुपे एक-एक कंकर, शंकर के समान माना जाता है। कंकर और रेत का रिश्ता भी अजीब है। जो कंकर मुझमें ही पूरी तरह समा जाना चाहते हैं वे रेत का रूप ले लेते हैं। मैं जब अमरकंटक से निकलने के बाद लगभग 8 किलोमीटर दूरी पर दुग्धधारा जलप्रपात तथा 10 किलोमीटर पर दूरी पर कपिलधारा जलप्रपात बनाती हूं।

मंडला मेरी यात्रा का पहला पड़ाव है, जो अमरकंटक से लगभग 295 किमी की दूरी पर नर्मदा के उत्तरी तट पर बसा है। सुंदर घाटों और मंदिरों के कारण यहां पर स्थित सहस्रधारा का दृश्य बहुत सुन्दर है। कहते हैं कि राजा सहस्रबाहु ने यहीं अपनी हजार भुजाओं से मेरे प्रवाह को रोकने का प्रयत्न किया था, इसीलिए इसका नाम ‘सहस्रधारा’ है। संगमरमर की खूबसूरत संकरी घाटियों से बलखाती मैं नरसिंहपुर-होशंगाबाद की धरती को अभिस्पर्श करती हूं। यह स्थान जबलपुर से 19 किमी पर स्थित है। किसी जमाने में भृगु ऋषि ने यहां पर तप किया था।

उत्तर की ओर से वामन गंगा नाम की एक छोटी नदी नर्मदा में मिलती है। इस संगम अर्थात भेड़ा के कारण ही इस स्थान को ‘भेड़ा-घाट’ कहते हैं। यहां थोड़ी दूर पर नर्मदा का एक ‘धुआंधार’ प्रपात है। धुआंधार के बाद साढ़े तीन किमी तक मेरा प्रवाह दोनों ओर सौ-सौ फुट से भी अधिक ऊंची संगमरमरी दीवारों के बीच से सिंहनाद करता हुआ गुजरता है।

भेड़ा-घाट के बाद दूसरे मनोरम तीर्थ हैं- ब्राह्मण घाट, रामघाट, सूर्यकुंड और होशंगाबाद। इसमें होशंगाबाद प्रसिद्ध है। यहां पहले जो गांव था, उसका नाम ‘नर्मदापुर’ था। इस गांव को होशंगशाह ने नए सिरे से बसाया था। यहां सुंदर और पक्के घाट हैं, लेकिन होशंगाबाद के पूर्व के घाटों का ही धार्मिक महत्व है। होशंगाबाद से निकलने के बाद में नेमावर में विश्राम करती हूं। नेमावर में सिद्धेश्वर महादेव का महाभारत कालीन प्राचीन मंदिर है। नेमावर नर्मदा की यात्रा का बीच का पड़ाव है, इसलिए इसे ‘नाभि स्थान’ भी कहते हैं। यहां से भरूच और अमरकंटक दोनों ही समान दूरी पर है। पुराणों में इस स्थान का ‘रेवाखंड’ नाम से कई जगह महिमामंडन किया गया है।

 

नेमावर और ओंकारेश्वर के बीच धायड़ी कुंड नर्मदा का सबसे बड़ा जल-प्रपात है। 50 फुट की ऊंचाई से यहां मैं एक जल कुंड में गिरती हूं। जल के साथ-साथ इस कुंड में छोटे-बड़े पत्थर भी गिरते रहते हैं, जो जलघर्षण के कारण सुंदर, गोल और चमकीले शिवलिंग बन जाते हैं। सारे देश में शिवलिंग अधिकतर यहीं से जाते हैं। यहीं पुनासा की जल विद्युत-योजना का बांध बना हुआ है। ओंकारेश्वर के बारे में कहते हैं कि वराह कल्प में जब सारी पृथ्­वी जल में मग्न हो गई थी तो उस वक्त भी मार्कंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता था। यह आश्रम नर्मदा के तट पर ओंकारेश्वर में है।

ओंकारेश्वर में ज्योर्तिलिंग होने के कारण यह प्रसिद्ध प्राचीन हिंदू तीर्थ है। ओंकारेश्वर के आसपास दोनों तीरों पर बड़ा घना वन है, जिसे ‘सीता वन’ कहते हैं। वाल्मीकि ऋषि का आश्रम यहीं कहीं था। अब मैं महेश्वर से करीब हूं। करीब 64 किलोमीटर दूर। महेश्वर से पहले उत्तर तट पर एक कस्बा है मंडलेश्वर। विद्धानों का मत है कि मंडन मिश्र का असली स्थान यहीं है और महेश्वर को प्राचीन माहिष्मती नगरी माना जाता है। महेश्वर से कोई 19 किमी पर खलघाट है। इस स्थान को ‘कपिला तीर्थ’ भी कहते हैं। कपिला तीर्थ से 12 किमी पश्चिम में धर्मपुरी के पास महर्षि दधीचि का आश्रम बताया गया है। स्कंद-पुराण और वायु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है।
धर्मपुरी के बाद कुश ऋषि की तपोभूति शुक्लेश्वर से आगे मैं चरवलदा पहुंचती हूं। माना जाता है कि यहां विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्री वसिष्ठ और कश्यप ने तप किया था। शुक्लेश्वर से लगभग पांच किलोमीटर बड़वानी के पास सतपुड़ा की घनी पहाड़ियों में बावन गजा में भगवान पार्श्वनाथ की 84 फुट ऊंची मूर्ति है। यह एक जैन तीर्थ है। बावन गजा की पहाड़ी के ऊपर एक मन्दिर भी है। हिन्दुजन इसे दत्तात्रेय की पादुका कहते हैं। जैन इसे मेघनाद और कुंभकर्ण की तपोभूमि मानते हैं।

बावन गजा के आगे वरुण भगवान की तपोभूमि हापेश्वर के दुर्गम जंगल के बाद शूलपाणी नामक तीर्थ है। यहां शूलपाणी के अलावा कमलेश्वर, राजराजेश्वर आदि और भी कई मन्दिर हैं। शूलपाणी से आगे चलकर गरुडेÞश्वर, शुक्रतीर्थ, अंकतेश्वर, कर्नाली, चांदोद, शुकेश्वर, व्यासतीर्थ होते हुए मैं अनसूयामाई के स्थान पहुंचती हूं, जहां अत्री ऋषि की आज्ञा से देवी अनसूयाजी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तप किया था और उससे प्रसन्न होकर ब्रहा, विष्णु, महेश तीनों देवताओं ने यहीं दत्तात्रेय के रूप में उनका पुत्र होकर जन्म ग्रहण किया था। आगे कंजेठा है जहां शकुन्तला के पुत्र भरत ने अनेक यज्ञ किए। फिर और आगे सीनोर में ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अनेक पवित्र स्थान से गुजरती हूं।

सीनोर के बाद भरूच तक कई छोटे-बड़े गांव के बाद अंगारेश्वर में मंगल ने तप करके अंगारेश्वर की स्थापना की थी। कहते हैं कि अंगारेश्वर से आगे निकोरा में पृथ्वी का उद्धार करने के बाद वराह भगवान ने इस तीर्थ की स्थापना की। फिर आगे क्रमश: लाडवां में कुसुमेश्वर तीर्थ है।

मंगलेश्वर में कश्यप कुल में पैदा हुए भार्गव ऋषि ने तप किया था। इसके बाद कुछ मील चलकर मैं भरूच पहुंचती हूं, जहां मैं समुद्र में मिल जाती हूं। भरूच को ‘भृगु-कच्छ’ अथवा ‘भृगु-तीर्थ’ भी कहते हैं। यहां भृगु ऋषि का निवास था। यहीं राजा बलि ने दस अश्वमेध-यज्ञ किए थे। भरूच के सामने के तीर पर समुद्र के निकट विमलेश्वर नामक स्थान है।
शास्त्रों में जिस वेद से मेरा संबंध है, वह सामवेद है। गंगा को ऋग्वेद, यमुना को यजुर्वेद, सरस्वती को अथर्ववेद और मैं सामदेव। सामदेव कलाओं का प्रतीक है। भारत की नदियों में मेरा अपना महत्व है। न जाने कितनी भूमि को मैंने हरा-भरा बनाया है। कितने ही तीर्थ आज भी प्राचीन इतिहास के गवाह हैं। मेरे जल का राजा मगरमच्छ है। जिसके बारे में कहा जाता है कि धरती पर उसका अस्तित्व 25 करोड़ साल पुराना है।

मैं मगरमच्छ पर सवार होकर ही यात्रा करती हूं। मगरमच्छ विलुप्त हो गया है। कहीं-कहीं ये मुझसे मिलने और खैर-खबर लेने आ जाता है। मगरमच्छ के विलुप्त होने का कारण मानव सभ्यता और विकास है। मानव ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए ही जीव-जंतु, नदी-नालों को भी नहीं छोड़ा। मेरे गर्भ से जीव-जंतु लुप्त हुए तो मानव ने मेरे सहयात्री कंकर और रेत पर हमला बोल दिया। वो रेत जिसे मैं तटों पर छोड़ देती हूं। धरती उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए। खेतों में रेत जमा होने से किसान को कुछ परेशानी तो होती है, वह इसे खुशी-खुशी स्वीकार करता है।

आप तो मानव हैं। चांद से भी आगे आप पहुंच चुके हैं। इतनी सी बात तो आपको पता ही होगी कि इस रेत में पैदा होने वाले तरबूज और खरबूज का स्वाद ही निराला होता है। मेरी रेत के सौदागरों के कारण अब आज की पीढ़ी को वो स्वाद ही नहीं मिल पाता है। कुछ वर्ष पूर्व तक मेरे दोनों किनारे गर्मी का मौसम आने से पहले डंगरवाड़ियों से सजे होते थे।

बेमिसाल स्वाद वाले तरबूज और खरबूज की हर जगह चर्चा हुआ करती थी। डंगरवाड़ियां कभी इस जगह की पहचान हुआ करती थीं, जिनसे उपजे तरबूज और खरबूज कई जिलों में सिर्फ नर्मदा के नाम से बिका करते थे, लेकिन आज उन डंगरवाड़ियों को लगाने के लिए रेत ही नहीं बची, जिससे तरबूजों और खरबूजों में मिठास आती थी।

जब रेत नहीं बची तो अब डंगरवाड़ी लगाने वाले लोग इसे मिट्टी में ही लगाने लगे हैं। अब इसके स्वाद में वो बात नहीं है। गर्मी के मौसम से रेत में लगने वाली डंगरवाड़ियों से पलने वाले कई परिवारों की रोजी रोटी भी खत्म हो गई है। कई

दिनों तक घंटों जेसीबी से रेत निकालने का काम चलता रहता है। रही सही कसर निकाल ली रेत का अवैध कारोबार करने वालों ने, विगत वर्षों में रेत कारोबार से जुडेÞ लोगों ने रेत उठाने का सिलसिला जो शुरू किया वह इतना आगे निकल आया कि बडेÞ और इज्जतदार लोगों के डंपर भी अब रेत ढोते देखे जा सकते हैं।

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