मंत्रियों की संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करने में डर कैसा

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देश में सूचना का अधिकार कानून लागू होने के बाद सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों की संपत्ति का विवरण विभागीय वेबसाइट पर अपलोड किया जाने लगा है। इस व्यवस्था को लागू हुए लगभग एक दशक का वक्त होने आ रहा है। सरकारी कर्मचारियों की संपत्ति सार्वजनिक हो जाने के बाद यह दावा नहीं किया जा सकता कि सिस्टम में भ्रष्टाचार कम हो गया है। जिस तेजी से रुपए की कीमत गिरती है उतनी ही तेजी से सिस्टम में भ्रष्टाचार बढ़ता है। रुपया गिरेगा तो महंगाई होगी। महंगाई बढ़ेगी तो अधिकारियों की मांग भी बढ़ जाएगी। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में अक्सर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के भाषण का जिक्र करते हैं। जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली से एक रुपया भेजते हैं तो नीचे तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुंचते हैं। राजीव गांधी के इस कथन का सीधा अर्थ यही था कि बड़ी राशि भ्रष्टाचार के मद में चली जाती है। राजीव गांधी सरकार का दौर ऐसा दौर था जिसमें कंप्यूटराइजेशन अथवा ऑनलाइन पेमेंट का कोई सिस्टम विकसित नहीं हुआ था। देश में कंप्यूटर लाने की पहल राजीव गांधी ने ही की थी। राजीव गांधी ने देश में जब कंप्यूटर तकनीकी उपयोग करने का फैसला लिया था, उस वक्त भारतीय जनता पार्टी ने इसका काफी विरोध किया था। भारतीय जनता पार्टी का विरोध इस बात पर था कि कंप्यूटर आने के बाद देश में बेरोजगारी बढ़ जाएगी। पिछले दो दशक से आईटी क्षेत्र में सबसे ज्यादा रोजगार देखे जा रहे हैं। इस क्षेत्र में स्थिति यह हो गई है कि योग्य व्यक्ति अधिक हैं और रोजगार इतने नहीं हैं जितना कि मानव संसाधन उपलब्ध है। देश में आईटी के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। उससे सिस्टम में काफी बदलाव भी आए हैं। सूचनाओं का आदान प्रदान भी तेजी से होने लगा है। राजनीतिक दल भी आईटी का उपयोग करने लगे हैं।


सोशल मीडिया प्रचार का एक बड़ा माध्यम बन गया है। इसके खतरे भी कई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस खतरे को महसूस कर रहे हैं और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सरकारी निगरानी रखना चाहते हैं। देश में लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी संविधान से मिली हुई है। सूचना का अधिकार भी लोगों का कानूनी अधिकार है। सूचना के अधिकार कानून से बचने के रास्ते भी नौकरशाही ने निकाल लिए हैं। नौकरशाही की पहली कोशिश यह होती है कि कानून के तहत मांगे गए दस्तावेज दिए ही ना जाएं। सुरक्षा संबंधी और वित्तीय मामलों को छोड़कर सभी मामले सूचना के अधिकार के दायरे में रखे गए थे। वर्तमान व्यवस्था में शासकीय सेवक की गोपनीय चरित्रावली को व्यक्तिगत स्वरूप की जानकारी के रूप में श्रेणीबद्ध किया गया है। पहले ऐसा नहीं था। अब विभाग शासकीय सेवक की गोपनीय चरित्रावली देने से यह कहकर इंकार कर देते हैं कि इसे उजागर करने में कोई सार्वजनिक हित नहीं है। जबकि शासकीय सेवक की हर गतिविधि का संबंध जनता से जुड़ा हुआ होता है। कोई भी शासकीय सेवक व्यवसाय नहीं कर सकता। टीचर, ट्यूशन नहीं पढ़ा सकता। लेकिन, डॉक्टर को प्रायवेट प्रैक्टिस करने की इजाजत है। कोई भी व्यक्ति जब सरकारी नौकरी में आता है तो उसे अपनी चल-अचल संपत्ति का विवरण सरकार को अनिवार्य रूप से देना होता है। इसके बाद हर साल संपत्ति के बारे में घोषणा पत्र देना होता है। कोई चल-अचल संपत्ति खरीदना है तो सरकार से पहले मंजूरी लेना होती है। सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा हर साल संपत्ति का जो विवरण दिया जाता था, पहले वो फाइलों में ही दर्ज रहता था। लेकिन अब सार्वजनिक किया जाता है। विभाग अपनी वेबसाइट पर डालते हैं। ये बात और है कि अधिकांश विभागों की वेबसाइट अपडेट ही नहीं होती। वेबसाइट अपडेट करने की जिम्मेदारी विभाग की ही है। विभाग अपडेशन करने वाली एजेंसी को डाटा ही उपलब्ध नहीं कराते हैं। शासकीय सेवक की संपत्ति सार्वजनिक करने के पीछे सरकार की मंशा भ्रष्टाचार को रोकने की रही है।


शासकीय सेवक के वेतन भत्ते भी गोपनीय नहीं हैं। वेतन-भत्तों के आधार पर ही यह तय होता है कि उसके पास कुल कितनी संपत्ति स्वयं के स्रोतों से होना चाहिए। मंत्रियों के मामले में अब तक ऐसी कोई व्यवस्था विकसित नहीं हुई है। जिसके चलते उन्हें हर साल अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करना पड़े। कतिपय राजनेता अथवा राजनीतिक दल, नैतिकता के आधार पर यदाकदा संपत्ति का विवरण विधानसभा के पटल पर रख देते हैं। जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत विधानसभा, लोकसभा अथवा राज्यसभा का चुनाव लड़ने वाले अभ्यर्थियों को नामांकन पत्र के साथ अपनी संपत्ति का विवरण भी देना होता है। स्थानीय चुनाव में हिस्सा लेने वाले उम्मीदवारों को भी संपत्ति की घोषणा करनी होती है। इसमें लेनदारी और देनदारी दोनों का विवरण दिया जाता है। कुछ वर्षों पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह घोषणा की थी कि वे और उनके मंत्री हर साल अपनी संपत्ति का विवरण विधानसभा के पटल पर रखेंगे। इस नैतिक निर्णय का पालन खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नहीं किया। ना उन्होंने कभी अपनी संपत्ति का विवरण सदन के पटल पर रखा और ना ही उनके मंत्रियों ने ऐसी कोई पहल की। सरकार और उसके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के कई आरोप अलग-अलग समय लगते रहे हैं। पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार की जांच करने वाली सर्वोच्च संस्था लोकायुक्त का भी राजनीतिकरण देखने को मिला है । मंत्रियों के खिलाफ आने वाली शिकायतों को प्रारंभिक जांच के बगैर ही बंद कर दिया जाता है । राज्य में ऐसे कई मामले देखने में आए हैं जिसमें मंत्री के रिश्तेदार अथवा आश्रित उसी विभाग में ठेकेदारी अथवा अन्य कोई कार्य कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर आवास एवं पर्यावरण विभाग के मंत्री के नाते रिश्तेदार अथवा आश्रित यदि कॉलोनाईजिंग आदि का काम कर रहे हैं तो आवश्यक मंजूरी में अधीनस्थ अधिकारियों का निर्णय हमेशा ही सवालों के घेरे में रहता है।

इसी तरह यदि लोक निर्माण विभाग के मंत्री के रिश्तेदार सड़क बनाने का काम कर रहे होंगे तो विभागीय इंजीनियर गुणवत्ता का परीक्षण निष्पक्षता से नहीं कर पाएगा? चुने हुए प्रतिनिधियों को नैतिक आधार पर ऐसे विभाग की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए जिसमें कि उनके आश्रित अथवा नाते-रिश्तेदार कार्य करते हैं । यदि फिर भी ऐसे विभाग की जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं तो कहीं ना कहीं किसी मामले में उन पर पक्षपात और प्रश्रय देने का आरोप लग सकता है । संवैधानिक पद पर बैठे मंत्री अथवा शासकीय सेवक के खिलाफ अदालत में भ्रष्टाचार का अथवा भ्रष्ट को बचाने, संरक्षण देने का कोई मामला अदालत में सीधे नहीं चलाया जा सकता। भारसाधक मंत्री अपने विभाग का प्रशासनिक मुखिया होता है। प्रशासनिक मुखिया के नाते वह भी शासकीय सेवक की श्रेणी में आ जाता है । मंत्री के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए राज्यपाल की मंजूरी लेना अनिवार्य होता है । सरकारी कर्मचारियों के मामले में सीआरपीसी की धारा 197 का संरक्षण प्राप्त होता है । यही प्रावधान मंत्री पर भी लागू होता है। इस प्रावधान के चलते अभियोजन का मामला चलाने के लिए सरकार से लिखित मंजूरी लेना जरूरी होता है । मंजूरी न होने की स्थिति में अदालत चालान को स्वीकार ही नहीं करती है । सीआरपीसी के प्रावधान मंत्रियों और शासकीय सेवकों पर जब समान रूप से लागू हैं तो संपत्ति के विवरण के मामले में दोहरी नीति समझ से परे है? जिस तरह से सीआरपीसी के प्रावधान मंत्रियों पर लागू होते हैं, उसी तरह से संपत्ति का विवरण हर साल सार्वजनिक करने की अनिवार्यता भी मंत्रियों पर लागू होना चाहिए। राजनीतिक स्वच्छता और शुचिता की दृष्टि से भी यह आवश्यक है।

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