नागपुर में प्रणब मुखर्जी ने आरएसएस मुख्यालय में भारत की बहुलतावादी संस्कृति का बखान किया

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 07 जून की शाम नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय में स्वयंसेवकों को संबोधित किया।

नागपुर में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 07 जून की शाम को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय में स्वयंसेवकों को संबोधित किया।
इस कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद थे। प्रणब मुखर्जी का आरएसएस मुख्यालय जाना सबको चौंकाने वाला था। हालांकि प्रणब मुखर्जी ने अपनी पहचान और राजनीतिक जीवन के अनुरूप ही सारी बातें कहीं

प्रणब मुखर्जी के संघ के मुख्यालय में जाने और वहां पर संघ के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को भाषण देने के फैसले पर हर जगह चर्चा हो रही है। 07 जून की शाम को उन्होंने जो भाषण दिया, उसका हर कोई अपने-अपने हिसाब से मायने निकाल रहा है। इससे पहले पूरी कांग्रेस असहज नजर आ रही थी। यहां तक कि उनकी बेटी और कांग्रेस नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा कि उनका (डॉ.मुखर्जी) भाषण किसी को याद नहीं रहेगा हां, उनकी तस्वीर का इस्तेमाल जरूर किया जाएगा।

लेकिन कुशल राजनेता मुखर्जी बिना किसी दबाव में आए संघ के कार्यक्रम में गए और अपने ‘उच्चस्तरीय’ भाषण के जरिये संघ को उसी के मच पर कई नसीहतें दें डालीं। प्रणब मुखर्जी अपना भाषण अंग्रेजी में दे रहे थे, मगर बीच-बीच में वह अपनी मातृभाषा बांग्ला के मुहावरों का इस्तेमाल भी कर रहे थे। इससे पहले डॉ. मुखर्जी ने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार को भारत माता का सच्चा सपूत भी कहा। यह बात उन्होंने विजिटर डायरी में लिखी है।

प्रणब मुखर्जी ने की बहुलतावादी संस्कृति की बात

हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को अपनी विचारधारा का केंद्र मानने वाले संघ के मंच पर पूर्व राष्ट्रपति ने सरल शब्दों में भारत की बहुलतावादी संस्कृति का बखान किया। उन्होंने आरएसएस काडर को बताया कि राष्ट्र की आत्मा बहुलवाद और पंथनिरपेक्षवाद में बसती है।

प्रणब मुखर्जी ने प्रतिस्पर्धी हितों में संतुलन बनाने के लिए बातचीत का मार्ग अपनाने की जरूरत बताई। उन्होंने साफतौर पर कहा कि घृणा से राष्ट्रवाद कमजोर होता है और असहिष्णुता से राष्ट्र की पहचान क्षीण पड़ जाएगी।

उन्होंने कहा, ‘सार्वजनिक संवाद में भिन्न मतों को स्वीकार किया जाना चाहिए।’
सांसद व प्रशासक के रूप में 50 साल के अपने राजनीतिक जीवन की कुछ सच्चाइयों को साझा करते हुए प्रणब ने कहा, ‘मैंने महसूस किया है कि भारत बहुलतावाद और सहिष्णुता में बसता है।’

उन्होंने कहा, ‘हमारे समाज की यह बहुलता सदियों से पैदा हुए विचारों से घुलमिल बनी है। पंथनिरपेक्षता और समावेशन हमारे लिए विश्वास का विषय है। यह हमारी मिश्रित संस्कृति है जिससे हमारा एक राष्ट्र बना है।’

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के दर्शनों की याद दिलाते हुए मुखर्जी ने कहा कि राष्ट्रीयता एक भाषा, एक धर्म और एक शत्रु का बोध नहीं कराती है।

उन्होंने कहा कि यह 1.3 अरब लोगों के शाश्वत एक सार्वभौमिकतावाद है जो अपने दैनिक जीवन में 122 भाषाओं और 1,600 बोलियों का इस्तेमाल करते हैं।
वे सात प्रमुख धर्मो का पालन करते हैं और तीन प्रमुख नस्लों से आते हैं और एक व्यवस्था से जुड़े हैं।

उनका एक झंडा है। साथ ही भारतीयता उनकी एक पहचान है और उनका कोई शत्रु नहीं है। यही भारत को विविधता में एकता की पहचान दिलाता है।”

मोहन भागवत ने संबोधित किया

प्रणब मुखर्जी से पहले स्वयंसेवकों को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संबोधित किया। मोहन भागवत ने अपने संबोधन की शुरुआत प्रणब मुखर्जी के आने पर उठी बहस से की। मोहन भागवत ने कहा कि आना जाना लगा रहता है। उन्होंने कहा कि संघ, संघ रहेगा और प्रणब मुखर्जी, प्रणब मुखर्जी ही रहेंगे।

मोहन भागवत ने कहा, ”हमने प्रणब मुखर्जी को कैसे बुलाया और वो कैसे आए ये मुद्दा नहीं है। विविधिता में एकता हमारी हज़ारों सालों की परंपरा है। भाषा और पंथ परंपरा की विविधता तो पुरानी है। राजनीतिक मत प्रवाह में विविधता तो बनती रहती है। हम इसी विविधता में भारत मां के पुत्र हैं। एक दूसरे की विविधिता को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना ही भारत के हक़ में है।”

संघ प्रमुख ने कहा, ”किसी राष्ट्र का भाग्य व्यक्ति, सरकार और विचार से नहीं बनता। देश का सामान्य समाज जब गुणसंपन्न बनकर देश के लिए पुरुषार्थ करने के लिए तैयार होता है, तभी देश का भाग्य बदलता है।”

मोहन भागवत ने कहा, ”1911 में डॉ हेडगेवार के मन में आरएसएस बनाने की सोच आई थी। उन्होंने 1911 से सारे प्रयोग करना शुरू किया था और 1925 में 17 लोगों के साथ आरएसएस गठन किया। सबकी माता भारत माता हैं। सबके पूर्वज समान हैं। सबके जीवन के ऊपर भारतीय संस्कृति का प्रभाव है। संघ सबको जोड़ने वाली संस्था है। संगठित समाज ही हमारी पूंजी है। ”

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संघ का काम केवल संघ का नहीं है। ये तो सबके लिए है। इसको देखने के लिए अनेक महापुरुष आये”

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