राहुल गांधी ने आखिर दिग्विजय का नाम क्यों नहीं लिया,समर्थकों में है निराशा

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को मंदसौर में आयोजित किसान रैली में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का नाम एक बार भी नहीं लिया। कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने पूरे भाषण में सिर्फ कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया का ही जिक्र किया। दिग्विजय सिंह किसान सभा के मंच पर मौजूद जरूर थे,लेकिन वे पूरे समय चुपचाप बैठे रहे है। राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह को राज्य के नेताओं के बीच समन्वय की जिम्मेदारी सौंपी है।

दिग्विजय समर्थकों में है निराशा

दिग्विजय सिंह पंद्रह साल बाद राज्य में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लिए मैदानी स्तर पर पार्टी नेताओं के बीच समन्वय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली समन्वय समिति ने टीकमगढ़,पन्ना एवं छतरपुर जिले का दौरा कर वहां गुटों में बंटी कांग्रेस को एक करने का प्रयास किया है। दिग्विजय सिंह को समन्वय की जिम्मेदारी मिलने के बाद राज्य में उनके सर्मथक उत्साहित हैं। राहुल गांधी के फैसले से दिग्विजय सिंह की भूमिका को अन्य नेताओं की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कमलनाथ को कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी का चेहरा हैं। उन्हें प्रचार प्रमुख बनाया गया है। सुरेश पचौरी को चुनाव की रणनीति बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। मंदसौर की सभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने बार-बार कमलनाथ और सिंधिया का नाम ही लिया।

दिग्विजय सिंह का जिक्र एक बार भी नहीं किया। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस अब एक है। लेकिन, पूरे कार्यक्रम में कई नेता अपने आपको उपेक्षित महसूस करते रहे। राहुल गांधी ने जब मंदसौर में पुलिस फायरिंग के शिकार किसानों के परिजनों से मुलाकात की तब भी दिग्विजय सिंह साथ नहीं थे।

दिग्विजय सिंह एक दिन पहले ही मंदसौर पर पहुंच गए थे। जबकि अन्य नेता राहुल गांधी के आने के कुछ घंटे पूर्व ही मंदसौर पहुंचे थे। मंदसौर के पूरे कार्यक्रम की तैयारियों में पार्टी के चारों कार्यवाहक अध्यक्ष जुटे हुए थे। राहुल गांधी ने मीनाक्षी नटराजन और सुरेश पचौरी का नाम भी नहीं लिया।

कांग्रेस दिग्विजय सिंह को चुनाव का मुद्दा नहीं बनाना चाहती

कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने से भाजपा को चुनाव आसान लग रहा है। भाजपा नेताओं का मानना है कि मतदाताओं के बीच आज भी कमलनाथ के सामने अपनी पहचान का संकट है। सिंधिया का चेहरा चिर परिचत है।

दिग्विजय सिंह को समन्वय की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 2003 के मध्यप्रदेश के पहले के मध्यप्रदेश की तस्वीर मतदाताओं को दिखाने की रणनीति बना ली है।

इस रणनीति के तहत प्रचार भी शुरू कर दिया। संभवत: यही कारण है कि राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह को अपने से दूर रखा और भाषण में भी उनका जिक्र नहीं किया।

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