वन विभाग की इमेज बेहतर हुई- नरेंद्र कुमार

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लो प्रोफाइल अफसर माने जाने वाले हॉफ पीसीसीएफ नरेंद्र कुमार को महज 11 महीने का ही कार्यकाल मिला है। वे इसी महीने रिटायर हो रहे हैं। वे इस बात को लेकर संतुष्ट हैं कि वे सरकार की नजरों में वन विभाग की छवि सुधारने में कामयाब रहे हैं। 1978 बैच के आईएफएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार जून 2015 में हॉफ पीसीसीएफ बने। हॉफ पीसीसीएफ के रूप में काम करते हुए 11 महीने बीत गए हैं। उनके 9 महीने के कार्यकाल में यदि कुछ बदलाव आया तो वह यह कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नजरों में जंगल महकमे की इमेज बेहतर हुई है।
यही नहीं वे अपर मुख्य सचिव दीपक खांडेकर के साथ सामंजस्य बैठाकर विभाग की योजनाओं के क्रियान्वयन में जुटे हैं। वन अपराध रोकने और मैदानी अमले पर नकेल कसने के लिए मानीटरिंग सिस्टम में परिवर्तन करने जा रहे हैं। इसके लिए वे एक नया साफ्टवेयर डेवलप करा रहे हैं। इस साफ्टवेयर के जरिए डीएफओ से फारेस्ट गार्ड पर नजर रखी जाएगी कि वे फील्ड में पहुंच रहे हैं अथवा नहीं। नरेंद्र कुमार रिटायर होने के पहले वन विभाग में बहुत-कुछ करना चाहते हैं, किन्तु बजट में हुई 100 करोड़ की कटौती से विभाग के कई वर्किंग प्लान के क्रियान्वयन पर विराम लग सकता है। हालांकि श्री कुमार ने वनमंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार और राज्य शासन से अगले वित्तीय वर्ष में अतिरिक्त बजट देने का अनुरोध किया है।

विभाग के कार्य-कलापों, वन अपराधों सहित अन्य मुद्दों पर नरेंद्र कुमार से विस्तृत चर्चा की है। प्रस्तुत है चर्चा के अंश-

सवाल- वन अपराध जैसे अवैध कटाई, उत्खनन और अवैध परिवहन के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। इसे रोकने की क्या पहल की?

जवाब- वन अपराध रोकने के लिए गश्त लगाने पर अधिक जोर दिया है। मैदानी अमले को मुख्यालय छोड़कर फील्ड में अधिक से अधिक समय रहने के निर्देश दिए हैं। मैदानी अमले पर नजर रखने के लिए एक नया साफ्टवेयर डेवलप कर रहे हैं। इस साफ्टवेयर से यह आसानी से पता लगाया जा सकेगा कि अमुख डीएफओ, एसडीओ अथवा रेंजर किस क्षेत्र में गश्ती कर रहे हैं। इसके साथ ही मानीटरिंग सिस्टम को और भी चुस्त-दुरूस्त बना रहे हैं। यही नहीं, अब मैदानी अमले के अधिकारियों की मासिक टूर डायरी की भी मुख्यालय स्तर पर समीक्षा की जाएगी। इसके साथ ही सबकी जवाबदारी भी तय की जाएगी।

सवाल- आपका वायरलैस सिस्टम तो पहले से बंद है और अब सूचना तंत्र भी फेल हो गया है। ऐसे में वन अपराध पर रोक कैसे लगेगी?

जवाब- हां, यह सही है कि हमारे वायरलैस बंद पड़े हैं। नए वायरलैस सेट की आवश्यकता है। इसके खरीदने की अनुमति भी पूर्व में मांगी गई है, किन्तु रायल्टी शुल्क बकाया होेने के फलस्वरूप केन्द्र से अनुमति नहीं मिल पा रही है। वन विभाग पर 30 करोड़ रुपए वायरलैस की रायल्टी शुल्क बकाया है। इसके समायोजन के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर अपर मुख्य सचिव स्तर पर बातचीत भी हुई, परन्तु कोई रियायत नहीं मिली। जबकि वन विभाग केन्द्र सरकार के समवर्ती सूची में आता है। जिस तरह से गृह विभाग को वायरलैस रायल्टी शुल्क में छूट दी गई है, उसी तरह से वन विभाग को भी मिलना चाहिए। छूट नहीं मिलने पर अगले वित्तीय वर्ष के बजट में वायरलैस के रायल्टी शुल्क के भुगतान किए जाने का प्रावधान कर रहे हैं। इसके भुगतान के बाद नए वायरलैस सेट खरीदेंगे। जहां तक सूचना तंत्र की बात है तो उसे भी मजबूत बनाने की दिशा में काम चल रहा है। अभी संरक्षित क्षेत्र में इसे मजबूत किया जा रहा है।

सवाल- वन अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटनाएं बढ़ रही हैं। वन माफिया से निपटने के लिए क्या तैयारी है?

जवाब- यह बात सही है कि वन और वन्य प्राणियों की रक्षा में हमारे अधिकारियों और कर्मचारियों पर लगातार हमले हो रहे हैं। माफिया का दबाव बढ़ता जा रहा है। उनमें वन विभाग का कोई खौफ नहीं है। इसकी वजह यह है कि हम लंबे समय से राज्य सरकार से सीआरपीसी की धारा 129 के तहत प्रोटेक्शन का अधिकार मांग रहे हैं, किन्तु अभी तक उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है। हमारे पास हथियार चलाने के अधिकार नहीं है। जबकि माफियाओं के पास आधुनिक हथियार हैं, वहीं हम डंडे के बल पर उनका सामना करते आ रहे हैं। यह वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती है।

सवाल- सबसे अधिक वनाच्छादित क्षेत्र मध्यप्रदेश में है। बावजूद इसके, केन्द्र और राज्य ने वन विभाग के बजट में भारी कटौती की है। क्या बजट के अभाव में वन प्रबंधन का काम प्रभावित नहीं होगा?

जवाब- सूखे के कारण वन विभाग के वित्तीय वर्ष 2015-16 के बजट में भारी कटौती की गई है। बजट के अभाव में कई कार्य-आयोजना नहीं हो पाएंगे। राज्य सरकार से अतिरिक्त राशि देने का आग्रह किया है। वनमंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार ने भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से बात कर बजट दिलाने का आश्वासन दिया है।

सवाल- कर्मचारियों में असंतोष है। इसे दूर करने के लिए क्या करने जा रहे हैं?

जवाब- कर्मचारियों की समस्या जानने के लिए उनसे सीधा संवाद कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम में कर्मचारी बिना किसी संकोच अपनी समस्या सीधे उनके सामने रखते हैं। जायज समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जाता है।

सवाल- आजाद सिंह डबास क्यों व्यवस्था से रूठे हुए हैं? उन्होंने सिविल डे पर अपनी पीड़ा व्यक्त की, जिस पर मुख्य सचिव ने सख्त ऐतराज जताया। आखिर उनकी समस्या को क्यों अनसुना कर दिया गया?

जवाब- डबास ने जिस प्लेट फार्म पर बात कही है, वह गलत है। उन्हें अपने व्यक्तिगत मसले वहां नहीं उठाना चाहिए था। वे मुख्य सचिव अथवा मुझसे व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होकर अपनी समस्या कह सकते थे।

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