विधानसभा उपचुनाव :धारणा और विश्वसनीयता ही असल मुद्दा

shivraj V/S kamalnath
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विधानसभा उप चुनाव में धारणा और विश्वसनीयता।

ये दो शब्द बेहद अहम हैं।

दो चेहरों को इन शब्दों में वोटर तोल रहा है।

पहला चेहरा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का है।

दूसरा चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का है।

कमलनाथ केवल पंद्रह माह राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं।

शिवराज सिंह चौहान लगातार तेरह साल मुख्यमंत्री रहने के बाद पंद्रह माह के अंतराल से चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं।

विधानसभा उप चुनाव आम से भी ज्यादा खास

इस चुनाव में कई आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं। लेकिन,मुद्दा कोई नजर नहीं आ रहा।

कहने को यह उप चुनाव है,लेकिन आम चुनाव से भी ज्यादा खास है।

उप चुनाव में भी वोटर को यह तय करना है कि बदलाव करना है अथवा नहीं।

आम चुनाव के नतीजों के बाद बनी कांगे्रस की सरकार में जो बदलाव वोटर ने देखे,उसमें पाया कुछ नहीं था।

जो खोया उसका कोई हिसाब नहीं है।

बदलाव हुआ तो मेधावी छात्रों को फीस भरने के लाले पड़ गए थे।

कन्यादान की राशि तो मिली ही नहीं।

जबकि राशि बढ़ाकर देने का दावा किया जा रहा है।

लैपटॉप,साइकल और न जाने कितने सपने बदलाव की भेंट चढ़ गए थे।

पंद्रह माह की सरकार में लाडली का तो जिक्र ही नहीं हुआ।

ये वे योजनाएं हैं,जिनका लाभ आमजन को मार्च में शिवराज सिंह चौहान की सरकार वापस आने के बाद फिर से मिलने लगा है।

मध्यप्रदेश मे विधानसभा उप चुनाव 

शिवराज का चेहरा गरीब ,कमजोर की उम्मीद

शिवराज सिंह चौहान आमजन का चेहरा हैं।

यह धारणा कोई पिछले सात माह में नहीं बनी है।

इस धारणा को बनने में तेरह साल का लंबा वक्त लगा।

लोकसभा,विधानसभा और उप चुनाव की कई अग्नि परीक्षाओं से उत्पन्न यह धारणा है।

कमलनाथ का चेहरा आम आदमी का चेहरा नहीं बन सका?

दूसरी और कमलनाथ का चेहरा मुख्यमंत्री के तौर प्रदेश की जनता ने देखा। आमजन से दूर रहने वाले इस चेहरे ने कई नई धारणाओं को विकसित किया।

मुख्यमंत्री का यह चेहरा एक खास वर्ग के लिए ही काम करता दिखाई दिया।

हर वर्ग परेशान था। बाढ़ हो या कोई भी आपदा पंद्रह माह मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ लोगों की तकलीफ में उनके साथ खड़े नजर नहीं आए।

कमलनाथ खुद बड़े उद्योगपति हैं।

इस कारण उनकी सोच भी कारपोरेट कल्चर वाली थी। कम खर्च में ज्यादा मुनाफा कमाने की।

सरकारी खजाने पर उन्होंने बिल्कुल वैसे ही ताला लगाया था,जैसे कोई उद्योगपति अपने वर्कर को उचित मेहनताना देने के लिए लगाता है। पैसा न होने का रोना रो कर।

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पूंजीपति सोच में कभी गरीब किसान और मजदूर के कल्याण को देखा ही नहीं जाता।

कमलनाथ अभिजात्य वर्ग के मुख्यमंत्री हैं यह धारण पंद्रह माह में आमजन के जहन में उभरी है।

विश्वसनीयता के मामले में भी कमलनाथ जन आकांक्षाओं पर खरे नहीं उतरे।

विधानसभा के आम चुनाव में कांगे्रस पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने दस दिन में किसानों की कर्ज माफी का वादा किया था।

लेकिन,कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनी तो पंद्रह माह में भी दो लाख रूपए तक के कर्ज माफ नहीं हुए। राहुल गांधी कांगे्रस अध्यक्ष नहीं रहे।

सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे

राहुल गांधीकमलनाथ ने उन्हें भी अनदेखा करने में देर नहीं की।

कमलनाथ,राहुल गांधी की पसंद नहीं थे।

वे ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। कमलनाथ कांग्रेस पर काबिज कोटरी की मदद से मुख्यमंत्री बन गए।

उन्होंने सबसे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनीतिक तौर पर कमजोर करना शुरू कर दिया।

सरकार की ड्राइविंग सीट पर दिग्विजय सिंह नजर आ रहे थे। कमलनाथ तो उनकी छाया मात्र थे।

पंद्रह साल बाद भी दिग्विजय सिंह की छवि मिस्टर बंटाधार और मुस्लिम समर्थक नेता की बनी हुई है।

नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के मंत्री उनके पुत्र जयवर्द्धन सिंह थे। दिग्विजय सिंह ने सबसे पहले बड़े शहरों के मास्टर प्लान में बदलाव करना शुरू किया।

ग्वालियर में मास्टर प्लान में भी बदलाव किया गया।

सिंधिया इस बदलाव के पक्ष में नहीं थे।

कमलनाथ ने चुनावी वादों पर अमल न कर आमजन को बेहद निराश किया।

आम चुनाव में कांगे्रस पार्टी ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश भी नहीं किया था।

शिवराज के चेहरे से जुड़ा आम विश्वास

कमलनाथ को लेकर आमजन में विश्वास की कमी देखी गई।

जबकि शिवराज सिंह चौहान का चेहरा परखा हुआ है।

लोगों को विश्वास है कि परेशानी आने पर सरकार उनकी मदद के लिए खड़ी होगी।

उप चुनाव में धारणा और विश्वास के मुद्दे पर ही फैसला होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दोनों ही अपने-अपने पुत्रों को राजनीति में स्थापित करने की कोशिश में लगे हुए हैं।

बिकाऊ-टिकाऊ का नारा देकर इन दोनों नेताओं की कोशिश कांगे्रस पार्टी में विभाजन को रोकने की है।

विधायकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की है।

वैसे भी कमलनाथ ने ही विधायकों को दबाव में डालकर अपने पक्ष में करने की कोशिश की थी। नारायण त्रिपाठी और शरद कोल के जरिए। यह शुरूआत थी।

मध्यप्रदेश में राजनीति की नई संस्क्ृति को विकसित करने की।

विधानसभा में विधायकों की संख्या इस बात की ओर साफ इशारा कर रही है कि कांगे्रस किसी भी हाल में सरकार नहीं बना सकती।

विधानसभा उपचुनाव:पांच सीट जीत कर भी सत्ता में बने रहेंगे शिवराज

वर्तमान में भाजपा के पास कुल 107 विधायक हैं।

कांग्रेस के पास 87 विधायक हैं। 28 सीटों के चुनाव नतीजों के बाद भी एक सीट खाली रहेगी।

230 सदस्यों वाली विधानसभा में 10 नवंबर को कुल 229 विधायक होंगे।

सरकार बनाने के लिए 115 विधायक चाहिए।

इस लिहाज से कांग्रेस को सभी 28 सीटें जीतना होगीं।

बसपा-सपा और निर्दलीय का समर्थन मिलना भी जरूरी है।

कांग्रेस 28 से जितनी कम सीटें जीतेगी उसकी उतनी दूरी सरकार से बन जाएगी।

भाजपा पांच सीटें भी जीतती है तो सदन में उसके विधायकों की संख्या 112 हो जाएगी।

कांग्रेस के विधायकों की संख्या 110 ही रहेगी।

तब भी सबसे बड़े दल के नाते भाजपा को ही सरकार बनाने का अवसर मिलेगा।

कांग्रेस को सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक दल होना जरूरी है।

वैसे भी पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने हर इंटरव्यू में स्पष्ट कर रहे हैं कि वे सरकार बनाने के लिए उप चुनाव नहीं लड़ रहे।

फिर किस लिए उप चुनाव मैदान में है? शायद आयटम जैसे शब्दों के जरिए राजनीतिक विरोधियों को अपमानित करने के लिए?

विस्तृत के लिए देखें- http://powergallery.in

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