डेथ ऑडिट से कैसे छुप सकती हैं कोरोना से हुई मौतें: सर्टिफिकेट का सच

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर
भोपाल के भदभदा विश्राम घाट पर जलती चिंताएं

डेथ ऑडिट अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। यह प्रावधान नियमों में भी है। आखिर डेथ ऑडिट किया क्यों जाता है? इलाज के दौरान किसी मरीज की मौत हो जाने को चिकित्सा जगत भी गंभीरता से लेता है। रेमडेसिविर इंजेक्शन यदि डॉक्टर के द्वारा लिखा जा रहा है तो वह निश्चित तौर पर एक अंतिम कोशिश अपने मरीज को बचाने के लिए कर रहा होता है।पिछले साल कोरोना आने के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी। इसके पहले एक दिन जनता कर्फ्यू भी लगाया गया। लौटा-थाली भी लोगों ने बजाई थी। देश के पहले लॉकडाउन की काफी आलोचना हुई। पिछले दिनों राज्य के मुख्यमंत्रियों से बात करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन कारणों का उल्लेख किया,जिनके कारण लॉकडाउन करना पड़ा था। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियें से कहा कि गत वर्ष इन दिनों में हमारे हाल क्या थे। हमारे पास टेस्टिंग लैब ((testing lab)) नहीं थे। यहां तक कि मास्­क कहां से मिलेंगे भी चिंता का विषय था, पीपीई कि­ट नहीं थे। और उस समय हमारे लिए बचने का एकमात्र साधन बचा था लॉकडाउन, ताकि हम व्­यवस्­थाओं को एकदम से जितना तेजी से बढ़ा सकें और वो हमारी strategy काम आई। हम व्­यवस्­थाओं को बना सके, संसाधन खड़े कर पाए, हमारी अपनीcapability बढ़ाई। दुनिया से जहां से प्राप्­त कर सकते थे, कर पाए और लॉक­डाउन के समय का हमने उपयोग किया। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार- आज जो स्थिति है, आज जब हमारे पास सब संसाधन हैं तो हमारा बल और ये हमारी गवर्नेंस की कसौटी है, हमारा बल Micro Contentment Zone पर होना चाहिए। छोटे-छोटे Contentment Zone पर सबसे ज्­यादा होना चाहिए।

The Prime Minister, Shri Narendra Modi
The Prime Minister, Shri Narendra Modi


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसी थ्योरी पर चलते हुए लॉकडाउन से बचते दिखाई दे रहे हैं। यद्यपि राज्य के अधिकांश जिलों में सारी गतिविधियां रूक गईं हैं। ऑक्सीजन और रेमेडिसिविर इंजेक्शन की कमी ने लोगों के बीच डर पैदा कर दिया है। संक्रमण जिस दर से बढ़ रहा है,उसके हिसाब से सरकार सिर्फ अनुमान लगा सकती है कि आने वाले दिनों में उसे कितने ऑक्सीजन बेड की आवश्यकता होगी? तैयारियां अनुमान आधारित करना होगीं। सरकार को संक्रमण रोकने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। जो तैयारियां सरकार अब कर रही है,वह मार्च के पहले सप्ताह में ही शुरू कर देना चाहिए थी।संक्रमण से सैकड़ों लोग रोज मर रहे हैं। सरकार आधिकारिक तौर पर इन मौतों की पुष्टि नहीं कर रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सफाई देते हैं कि मौत का ऑडिट किया जाता है। इसकी रिपोर्ट आने में समय लगता है। सरकार कह रही है इस कारण ही कोरोना संक्रमण के कारण होने वाली मौतों की संख्या नहीं बताई जा रही है। जो लोग स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े हुए हैं,उनके लिए मुख्यमंत्री का यह बयान हैरान कर रहा है। हर अस्पताल में डेथ ऑडिट अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। यह प्रावधान नियमों में भी है। आखिर डेथ ऑडिट किया क्यों जाता है? इलाज के दौरान किसी मरीज की मौत हो जाने को चिकित्सा जगत भी गंभीरता से लेता है। रेमडेसिविर इंजेक्शन यदि डॉक्टर के द्वारा लिखा जा रहा है तो वह निश्चित तौर पर एक अंतिम कोशिश अपने मरीज को बचाने के लिए कर रहा होता है। डॉक्टर पर अपने पेशे का नैतिक दबाव भी होता है। मरीज के परिजनों का रूदन भी दबाव बढ़ाता है। डेथ ऑडिट की धारणा उन कारणों को तलाश करने के लिए विकसित की गई है,जिसमें यह पता लग सके कि मरीज को बचाने में संसाधनों की कमी थी,इलाज में लापरवाही थी अथवा इलाज समय पर नहीं मिला आदि-आदि। यह प्रक्रिया अस्पताल की आंतरिक प्रक्रिया है। लेकिन वर्तमान में जो मौत हो रही हैं,उसमें अस्पताल यह सर्टीफिकेट दे रहे हैं कि मृतक कोरोना संक्रमित था। इसी आधार पर अंतिम संस्कार कोविड प्रोटोकॉल के तहत किया जाता है।

भोपाल के भदभदा श्मशान घाट कर जो तस्वीर सामने आई वह पत्थर दिल इंसान को भी झकझोर कर रख देगी। सरकार को मौत के आकंडे छुपाने से क्या फायदा है। सत्ताधारी दल भाजपा के कार्यकत्र्ता बचाव में इस तरह का सवाल करते सुनाई दे जाएंगे। सरकार नकारात्मक आकंडों के जरिए जनता में अपनी छवि नाकरा की नहीं बनाना चाहती। जिन के परिजन बिछड़ गए हैं। वे भी कुछ दिनों में आपदा को सिर्फ किस्सों में याद रखेंगे। मध्यप्रदेश में भाजपा के राज करने का इतिहास लंबा होता जा रहा है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चार बैठने का रिकार्ड भी बन चुका है। कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की तुलना में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ज्यादा मजबूत रही है। 2005 के बाद भाजपा को राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बदलना पड़ा। पार्टी ने फैसले भी चौहान की मर्जी से ही लिए हैं। चाहे अनंत कुमार प्रभारी हो या फिर विनय सहस्त्रबुद्धे। शिवराज सिंह चौहान के पास मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने का सबसे ज्यादा अनुभव है। अनुभव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले नंबर हैं। ज्योति बसु की तरह की शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश में अपनी पकड़ को बेहद मजबूत रखा। राज्य की नौकरशाही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। नौकरशाही के कारण ही वे वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में गच्चा खाए थे। अब कोरोना संक्रमण का प्रसार रोकने के लिए नौकरशाही के पास कोई जादुई पुडिया नहीं है। संसाधनों की कमी से हो रहीं मौतें आक्रोश की वजह बनती जा रही हैं

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