शिवराज सिंह चौहान: चौथी पारी,चौदह साल कई वजह से बने बेमिसाल

शिवराज सिंह चौहान अद्वितीय हैं,बेमिसाल हैं। अद्भूत हैं। अतुलनीय हैं। जन नायक हैं। लोकप्रिय हैं। बहनों के भाई और बच्चों के मामा हैं। यही वे वजह नहीं हैं जिनके कारण शिवराज सिंह चौहान अपनी चौथी पारी का पहला कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। बहुत सारे दूसरे कारण भी हैं जिनके चलते शिवराज सिंह चौहान अगंद की तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिके हुए हैं। उनका कोई विकल्प नहीं है। 2018 में हुए विधानसभा के आमचुनाव में भाजपा सरकार से बाहर क्यों हुई? इस कारण की तलाश भजपा नेताओं ने भी कभी पूरी गंभीरता से नहीं की। शायद पंद्रह साल लगातार सत्ता में रहने के बाद भाजपा नेता राजनीति के मूल सिद्धांतों को विस्मृत कर चुके हैं।

shivraj singh chouhan
shivraj singh chouhan


वर्ष 2003 में जब उमा भारती ने भाजपा सरकार का नेतृत्व किया था तब शिवराज सिंह चौहान कहां थे? वे विदिशा से सांसद थे। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में भी शमिल नहीं थे। उमा भारती के विकल्प के तौर भाजपा के पास काबिल और लोेकप्रिय नेताओं की फौज थी। बाबूलाल गौर को हटाकर जब शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने तब भी वे विकल्प हीन नहीं थे। कई विकल्प पार्टी के पास थे। चौहान से वरिष्ठ और बराबरी से बात करने वाले कई नेता थे। गौर मंत्रिमंडल में थे। एक नरेन्द्र सिंह तोमर ने शिवराज सिंह चौहान का हाथ पकडकर राजनीति की तो वे केन्द्र में मंत्री हैं। तोमर का नाम हर बार चौहान के उत्तराधिकारी के तौर पर सामने आता है। पिछड़ा वर्ग के ही प्रहलाद पटेल को विरोध की क्या कीमत चुकाना पड़ी इसका अनुमान उनकी राजनीति यात्रा के पड़ाव पर नजर डालकर आसानी से लगाया जा सकता है।

आम चुनाव में मिली हार से लोकप्रियता प्रभावित

भाजपा के नेता व्यक्तिवाद और परिवारवाद का विरोध करते-करते इसका अनुकरण करने लगे हैं। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत मिलता तो मार्च में सरकार की वर्षगांठ मानाने की जरूरत नहीं पड़ती। पिछले दिसंबर में ही शिवराज सिंह चौहान पंद्रह साल मुख्यमंत्री रहने का जश्न मना चुके होते। वो भी शायद जंबूरी मैदान में। पंद्रह माह के बे्रक से चौहान का ट्रैक रिकार्ड भी प्रभावित हुआ है। चुनाव परिणामों ने उनकी लोकप्रियता पर भी सवाल खड़े किए। मार्च की सरकार नरेन्द्र-मोदी-अमित शाह की रणनीति का परिणाम है। एक तरह से यह सरकार चौहान को तौहफे के तौर पर मिली है। ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके विधायकों के कारण मिली। भाजपा के देवतुल्य कार्यकत्र्ता का कोई योगदान मार्च की सरकार में नहीं है।

शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में यदि दिग्विजय सिंह को चुनौती दी थी तो वर्ष 2004 में कमलनाथ को उनके गढ़ छिंदवाड़ा में चुनौती देने वाला कौन था? प्रहलाद पटेल ने ही कमलनाथ को चुनौती दी थी। प्रहलाद पटेल, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कोयला राज्य मंत्री थे। शिवराज सिंह चौहान से काफी आगे। काफी संभावनाएं पटेल के चेहरे में तलाशी जा रहीं थीं। उमा भारती के एक गलत राजनीतिक निर्णय के कारण ही चौहान के सामने कोई विकल्प बन नहीं बन पाया। कैलाश विजयवर्गीय,अनूप मिश्रा,अजय विश्नोई और गौरीशंकर शेजवार जैसे नेता अहम का शिकार होकर हासिए पर चले गए। शिवराज सिंह चौहान पैर में चक्कर और मुंह में शक्कर के सिद्धांत का पालन करते हुए आगे निकल गए।

मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा में कोई विकल्प नहीं

uma bharti
uma bharti

कुशाभाऊ ठाकरे की मंशा के विपरीत जाना अपने राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगाने जैसा था। शिवराज सिंह चौहान ने संघर्ष की राह चुनी तो आज मुख्यमंत्री की कुर्सी उनकी है। विक्रम वर्मा कहां हैं? अख्खड़ स्वभाव वाले। वीर भौग्या वसुंधरा। जिस तरह वीर धरा का उपभागे करते हैं उसी तरह मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री या कहें राजा वही बन सकता है जो शक्तिशाली है,समर्थ है और चुनौतियों को स्वीकार कर सकता है। शिवराज सिंह चौहान में चुनौतियों को स्वीकार करने की क्षमता है। उनके जीवन का तीसरा ब्रह वाक्य सिर पर बर्फ है। पैर में चक्कर,मुंह में शक्कर और सिर पर बर्फ जो व्यक्ति रखकर चलता है उसकी राह कितनी भी दुर्गम हो, सुगम बन जाती है। यदि ऐसा न होता तो पहले डंपर और फिर व्यापमं मामले के भंवर से वे निकलकर बाहर नहीं आ सकते थे।

नृपस्य चितं ,कृपणस्य वितम;त्रिया चरित्रं ,पुरुषस्य भाग्यम ;देवो न जानाति कुतो मनुष्य:। शिवराज सिंह चौहान कर्मशील हैं,इस कारण भाग्य भी उनका साथ दे रहा है। चौहान से वरिष्ठ,समकालीन और उनसे कनिष्ठ नेताओंं में ऐसे कितने हैं,जिसने प्रदेश भर की सड़कें नापी हो? शायद कोई नहीं। सभी यह मानकर चलते हैं कि राज्याभिषेक पार्टी की मर्जी पर निर्भर है। बाबूलाल गौर पार्टी लाइन पर चलकर भी अपनी कुर्सी नहीं बचा सके। उमा भारती विधायकों की संख्या बल के आधार पर भी दुबारा मुख्यमंत्री नहीं बन पाईं। शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री हैं। अतुल्य।
यदि आमजन के बीच खड़े होकर देख जाए तो शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाले एक साल में आपको सिर्फ निराशा दिखाई देगी। युवाओं में निराशा। महिलाओं में निराशा। उद्योग -धंधों में निराशा। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर निराशा। शिक्षा को लेकर निराशा। खास लोगों की दृष्टि से देखेगों तो चारों और हरियाली और खुशहाली दिखाई देगी। पिछले साल जब कोरोना आया था तब सरकार ने जो प्रतिबंध लोगों पर थोपे वे प्रतिबंध खास लोगों के लिए आपदा में अवसर साबित हुए।

मोदी के चेहरे के बगैर राज्य में भाजपा को मिली जीत

जनता ने पंद्रह माह भाजपा को सरकार से बाहर रखा तो उसका खामियाजा उसे वापसी पर भुगतना पड़ रहा है। राज्य में भ्रष्टाचार का सूचकांक सारे रिकार्ड तोड़ चुका है। सत्ता की राजनीति में सुशासन शब्द को रामबाण की तरह उपयोग किया जा रहा है। सुशासन के लिए जो रीति-नीति सरकार ने बनाई है,उसमें प्रशासन आमजन से दूर होता जा रहा है। सूचना प्रद्यौगिकी के कारण भी प्रशासन की जवाबदेही समाप्त होती जा रही है। सूचना एवं प्रद्यौगिकी ने भ्रष्टाचार के नए तरीके भर ईजाद किए हैं।

भ्रष्टाचार सुनियोजित,संगठित और लोगों को अपराधियों की तरह कटघरे में खड़ा कर किया जा रहा है। माफिया जैसे भारी-भरकम शब्दों के जरिए प्रशासन अपने भ्रष्टाचार और मनमानी को छुपाने का काम भी कर रहा है। अच्छे और सफल मुख्यमंत्री के लिए सुद़ढ सूचना तंत्र भी जरूरी होता है। वह नेता जमीन छोड़ देता है,जिसका सूचना तंत्र कमजोर होता है और संवाद न्यूनतम। चौथी पारी में शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर शकुन और चमक दिखाई नहीं देती। टेलीविजन की स्क्रीन पर जब वे भाषण देते दिखाई देते हैंं तो माथे पर की शिकन और चेहरे का तनाव छुपता नहीं है।

लुटिंयंस की दिल्ली रास नहीं आती

कोई न कोई वजह तो है,जिसके कारण शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर उलछन दिखाई दे रही है। हो सकता है कि कोरोना ने उनके पांव बांध रखे हो?संभव है कि सरकारी खजाने की माली हालत उन्हें परेशान कर रही हो। संभव है कि उन्हें नई जिम्मेदारियां देने की बात हो रही हो? शिवराज सिंह चौहान का मन मध्यप्रदेश में ही बसता है। नरेन्द्र मोदी की तरह उन्हें दिल्ली जाना पड़े तो बात दूसरी है। लुटिंयंस की दिल्ली उन्हें रास नहीं आती।

विस्तृत के लिए देखें http://powergallery.in/

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here