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मैं नर्मदा – मेरी रेत की कहानी…..

मैं नर्मदा – मेरी रेत की कहानी…..

मैं नर्मदा हूं। चिरकुंवारी। मेरी उत्पत्ति अपनी व्यथा को प्रदर्शित करने के लिए नहीं हुई है। महादेव ने जिस निमित्त मुझे इस मृत्यु लोक में भेजा वह काम में मैं बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा कर रही हूं। सुना है कि महाप्रतापी राजा शिवराज सिंह चौहान मुझे जीवित नदी का स्थान देने वाले हैं? जीवित नदी का अर्थ क्या है? यह मेरी समझ से परे है। मेरे जल से न जाने कितने शहरों के लाखों लोगों को जीवन मिल रहा है। मेरी संवेदनाएं अभी बाकी है। बस उन पर वेदनाओं की काली चादर भी चढ़ गई है। वेदना तो लोगों के निर्मम व्यवहार की वजह से है। मैं निर्मल और निश्च्छल हूं, शायद इस कारण आज के इंसान को पहचान नहीं पाती। मैं नहीं समझ पाती कि वो मेरे जल से अपने पाप धोने की भावना से आया अथवा मेरे गर्भ में समाई हुई रेत को तलाशने। मेरी आरती की जाती है, दीपदान किया जाता है।

 

चुनरी चढ़ाई जाती है। बड़े-बड़े आयोजन मेरे नाम पर किए जाते हैं। मैंने मेरे पास आने वाले इंसान को कुछ न कुछ फल किसी न किसी रूप में जरूर दिया है। भले ही उसने मुझे छलनी किया हुआ हो। इंसान का लालच इतना अधिक बढ़ गया है कि वह प्रकृति की अनुपम देन को भी नहीं बख्श रहा है। नोटों की अट्टालिकाएं खड़ी करने के लिए रेत का सौदा किया जा रहा है। न जाने इंसान को इतनी जरूरत क्यों पड़ गई। सुना है कि मेरी सहायक नदियों से भी रेत निकाली जा रही है। किसी भी नदी को नहीं छोड़ा जा रहा है। छोड़ेंगे भी क्यों, जब मुझे ही नहीं छोड़ा, जिसे मां कहते हैं। उसकी छाती पर बड़ी-बड़ी मशीनें उतार कर रेत ख्ािंची जा रही है। मुझे जीवित नदी का दर्जा देने के बाद ये मेरी आंचल की प्राकृतिक संपदा बच जाएगी? मैं तो रोज महाप्रतापी राजा का वचन सुन रही हूं। अमरकंटक में उन्होंने भरोसा दिलाया था कि यहां के पहाड़ों में यदि सोना भी होगा तो वे खनन की इजाजत नहीं देंगे।

 

बड़ा अच्छा लगा था सुनकर। एक उम्मीद बंधी थी। मेरे आचंल में सामने वाली कई नदियों ने मेरे कांधे पर सिर रखकर भरे गले से बताया है कि पर्वत राज भी बौने नजर आने लगे हैं। पर्वतों की देवी तो मां पार्वती हैं। पर्वत नहीं होंगे तो माता पार्वती रूष्ट न हो जाएंगी। वे हिमालय की बेटी है। मैं जिस समुद्र में जाकर मिलती हूं उसकी देवी मां लक्ष्मी है और माता सीता धरा की देवी हैं। उनकी उत्पत्ति धरा से ही तो हुई है। पहाड़ प्रकृति के सरंक्षण के उपयोग के लिए जल छोड़ते रहते हैं। समुद्र की देवी लक्ष्मी इंतजार करती हैं कि नदियां अपनी बहुमूल्य संपदा लाएंगी। देवों और असुरों ने जब समुद्र मंथन किया था तो अमृत से पहले बहुमूल्य संपदा तो ही मिली थी।

 

अब मां लक्ष्मी से मिलने खाली हाथ जाना पड़ता है। नजर झुक जाती है। जब वे पूछती हैं नर्मदा मेरे लिए कुछ लाई हो क्या? रेत के सौदागरों के कारण जीव-जंतु, जलीय पौधे सभी नष्ट हो गए हैं। चंद सिक्के आंचल में होते हैं, जो पूजा कर्म में लोग छोड़ते हैं, वो सिक्के मैं समुद्र तक ले ही नहीं जा पाती। कई गरीब बच्चे इन सिक्कों के लिए मेरे सूखने का इंतजार करते हैं। डूबकी लगाते हैं। अपनी जान पर खेलते रहते हैं। दूसरे वे लोग हैं, जो मेरी रेत से करोड़ों कमा रहे हैं। रेत निकालने के लिए मुझे हर घाट, हर तट पर छलनी किया जा रहा है। मैं अपनी दास्तां कहां से सुनाऊ अमरकंटक से या फिर होशंगाबाद से।
मेरी तलहटी से रेत खनन की सबसे मशहूर कहानी प्रतापी राजा के परिवार से जुड़ी हुई है। मुझे तो यकीन ही नहीं होता कि जो राजा मेरे संरक्षण की बात कर रहा है और मेरी यात्रा कर रहा है उसका परिवार रेत का उत्खनन भी कर सकता है? लेकिन यह सच है। मैं उन चेहरों को अच्छी तरह पहचानती हूं जो रेत का उत्खनन कर रहे हैं। वे भी तो आते हैं अपने पाप धोने के लिए, मेरी पूजा-अर्चना भी करते हैं। कभी-कभी तो वे उन डंपरों के साथ भी आते हैं, जिन पर चौहान ब्रदर्स लिखा होता है। इन डंपरों में खनन की गई रेत आसपास भेजी जाती है। रेत निकालने की आधुनिक तकनीकी तो इतनी पीढ़ादायक है कि मैं कांप उठती हूं। धरती के अंदर तक कंपन हो जाता है।

 

मुझे तो डर लगता है कि कहीं भूकंप न आ जाए। धरा तो यह सहन ही नहीं कर पाती। बड़ी-बड़ी मशीनों के जरिए रेत निकाली जाती है। रेत निकालने वालों का खौफ इतना है कि मुझे नर्मदा मैया कहने वाले होंठ उनका नाम भी नहीं ले पाते। किसी ने यदि कार्रवाई की भी तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ा। मैंने सुना है कि पर्यावरण की चिंता में सरकार ने हरित न्यायाधीकरण का गठन किया है। न्यायाधीकरण में मेरी तलहटी से निकाली जा रही रेत के खनन पर रोक भी लगाई गई, लेकिन यह रोक ज्यादा दिन नहीं चली। फिर से खनन होने लगा। खनन करने वाले इतने ताकतवर लोग हैं कि मान्यता और बंधन उनके आगे छोटे पड़ जाते हैं। कई स्थानों पर तो मेरी रेत निकालने के लिए ताकतवर लोग आपस में लड़ रहे हैं। जल की पवित्र धारा को लहू के रंग के लाल किया जा रहा है। बड़वानी जिले में तो मेरे नाम पर एक पूरा संगठन खड़ा हो गया। नर्मदा बचाओ आंदोलन के नाम का यह संगठन पहले बड़े बांधों का विरोध करता रहा। बड़े बांधों के निर्माण के कारण हजारों लोगों को अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि छोड़नी पड़ी। बांध का निर्माण तो कोई रोक नहीं पाया। अब मेरी रेत को लेकर खून-खराबा हो रहा है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर के लोगों पर भी आरोप लग रहे हैं कि वे रेत निकाल रहे हैं।

 

जबकि खुद मेधा पाटकर फरियादी बनकर सरकार पर खनन के आरोप लगा रही है। मैं मानती हूं कि इंसान को रेत की आवश्यकता है। मैंने कभी उनकी आवश्यकता पर उंगली नहीं उठाई। नदियों का तो जन्म ही होता है लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, चाहे वह मेरा उपयोग अन्य के उत्पादन में करें या फिर अपनी प्यास बुझाने के लिए। मेरी रेत मेरे श्रम से उत्पन्न होती है। कई आशियाने इसी रेत के सहारे बनते हैं, लेकिन सिर्फ रेत से महल खड़े नहीं किए जा सके। यह तो व्यवहारिक है, महल बनाने के लिए रेत के अलावा भी दूसरी चीजों की जरूरत होती है। लोग अब रेत का महल नहीं बना रहे, रेत से महल बना रहे हैं। पहले तो लोगों का काम सिर्फ खेतों में पड़ी रेत से चल जाता था लेकिन अब रेत में लोग सोना पैदा करने वाली वस्तु मानने लगे हैं। इसी कारण रेत निकालने के लिए नाव की जगह मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। किसान के खेत में पड़ी रेत को उठाना आसान नहीं है पर मेरे प्रवाह से उत्पन्न धरा पर विश्राम कर रही रेत को समेटना आसान हो गया है। अलीराजपुर, खरगोन, धार में लाखों हेक्टेयर केचमेंट एरिया इस रेत के कारण संरक्षित नहीं हो पाया। हरित न्यायाधीकरण ने कई कमेटियां भी बनाई, लेकिन कोई भी रिपोर्ट मेरी त्रासदी को बयां नहीं कर सकी।

 

रेत के उत्खनन के कारण मेरा अस्तित्व ही नहीं मेरी सहायक नदियों का भी अस्तित्व खतरे में पड़ा हुआ है। बारूरेवा, माछा, पांडाझिर, सीतारेवा, ऊमर नदियों की सतह पर पानी थामने वाली कपायुक्त लेयर पूरी तरह उजड़ गई। नदी का जल पाताल में चला गया। रह गया तो सिर्फ कूड़े-करकट का ढेर। मेरे दोनों तटों पर अब रेत के बजाए सिर्फ कीचड़ नजर आता है। एक तरफ जयकारें और दूसरी ओर फोकलेन मशीन और डंपरों की आवाजें। जो सड़कें मेरे श्रद्धालुओं के आवागमन के लिए बनाई गई उन्हें भी डंपरों ने तवाह कर दिया। मुझे यह देखकर दुख होता है कि जिन-जिन तटों पर प्रतापी राजा पहुंचे वहां ही खनन का काम उनके आने से पहले और उनके जाने के बाद भी जारी है।

 

मेरे उद्गम स्थल अमरकंटक से लेकर मंडला जिले के बीच के गांवों में होने वाला खनन सभी को दिखाई देता है। मेरी तलहटी से रेत निकालकर ले जाने का काम चुपचाप नहीं किया जा सकता। यह तो ऊंट की चोरी जैसा मामला है। रेत को डंपर में डालकर या अन्य किसी और साधन से लेकर ही जाना पड़ेगा। राजसेवक इस चोरी से अनजान नहीं हैं। वे तो बस आंखें फेर लेते हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि वे राजाज्ञा का पालन करें। राजाज्ञा तो यह है कि मेरी धार से एक तिनका भी रेत का न निकाला जाए। फिर भी सेवक इसका पालन नहीं करते। कहीं ये राजा की कथनी और करनी का फर्क तो नहीं दिखा रहा।

सीहोर जिले की नसरुल्लागंज तहसील में नीलकंठ स्नान करने का घाट है। विशेष पर्वों पर यहां हजारों लोग आते हैं। यह उत्तराण्य तट होने के साथ-साथ ही मेरा एवं कौशल्या का संगम स्थल है। यहां स्थित शिव मंदिर का पुराणों में उल्लेख होने के कारण लोग श्रद्धा से यहां आते हैं। यहां रेत का उत्खनन करने के कारण भक्तजनों को काफी समस्या का सामना करना पड़ता है। मेरी घाटी में कई छोटे-बड़े बांध बन रहे हैं। तलहटी पर रेत का खनन किए जाने से कई स्थानों पर बांध का इस्पेक्टर भी कमजोर हो गया है।

 

महेश्वर जल विद्युत परियोजना के डूब प्रभावित ग्राम लेपा क्षेत्र में उत्खनन ने बांध की नींव हिलाकर रख दी है। बांध प्रबंधन वर्ष 2011 से राजा को लगातार पत्र लिख रहा है। रेत खनन से होने वाले खतरों के बारे में भी बता रहा है। प्रबंधन ने लिखा है कि लेपा क्षेत्र में सुरक्षा बांध की नींव पोकलेन, जेसीबी व डंपर जैसी मशीनों की खुदाई से खोखली हो रही है। मेरी अवैध रेत खनन के कारण न सिर्फ मुझ पर असर पड़ रहा है बल्कि रेलवे के पुलों पर भी इसका असर पड़ रहा है। कई जगह ऐसी हैं जहां पर रेलवे के पुल बेहद कमजोर हो गए हैं।

 

इसके कारण कोई बड़ी दुर्घटना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। यदि इसी तरह से रेत खनन होता रहा तो ये सारे पुल किसी दिन भी ढह जाएंगे। मेरी सफाई का दावा करने वालों के लिए भी यह बात शर्मनाक होनी चाहिए कि मेरे अंदर ही गटर, नालों का पानी मिलाया जा रहा है। इसके कारण मेरी सेहत पर विपरीत असर पड़ रहा है। यदि मां पर ही इसका गलत असर होगा तो वह अपने बच्चों की सुरक्षा कैसे कर पाएगी। मेरे अंदर जलकुंभी ने भी अपने पैर पसार दिए हैं। मैं इसकी गिरफ्त में भी आ गई हूं।

 

मेरे जल का उपयोग तो कई विभाग करते हैं। इनमें नगरीय प्रशासन, नर्मदा विकास प्राधिकरण, जल संसाधन, जल निगम आदि, लेकिन मेरी सुरक्षा और सफाई को लेकर किसी का भी ध्यान नहीं है। बताते हैं कि मेरी सफाई के लिए 4 हजार करोड़ रुपए की योजना तैयार की गई थी, लेकिन इस योजना को शुरू करने के लिए अब तक कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए हैं। भू-जलविद एके केशरवानी ने साल 2013 में ही ये जानकारी दी थी कि साल दर साल बारिश में बदलाव हो रहा है। कभी एक दिन में 5 इंच बारिश हो जाती है और कभी पानी हफ्तों नहीं गिरता। इसका सीधा असर नदियों के भू-जल स्तर पर पड़ रहा है। इसकी जांच के लिए फियोटिक लाइन सर्वे करना चाहिए। इसमें नदियों के दोनों तरफ कुछ दूरी पर परपेण्डीकुलर (सीध में) तरीके से बोरिंग करके भू-जल स्तर की नाप जोख की जानी चाहिए, जिससे यह पता चल सके कि आखिर नदी के किस हिस्से में जलस्तर गिर रहा है। नदियों के उन्हीं हिस्सों में स्टापडेम, वॉटर शेड से जुड़े काम होने चाहिए। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1980 से लेकर आगे के कई वर्षों तक फियोटिक लाइन सर्वे किया गया।

यह काम प्रदेश में भी किया जाना जरूरी हो गया है।

मैं बात होशंगाबाद में होने वाली खनन की कर रही थी। यहां रेत निकालने वालों को पकड़ा तो गया, उन पर करोड़ों का जुर्माना भी लगाया गया। लेकिन एक धेले की भी वसूली नहीं हुई। मालीखेड़ा से सटे ग्राम बांद्राभान में भी रेत का उत्खनन हो रहा है। बांद्राभान वही जगह है जहां मेरे शुभचिंतक अनिल दबे ने समागम किया था। देश-विदेश से कई लोग आए थे। टेंट-तंबू लगे हुए थे। मेरे संरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें हुर्इं। बाद में वे भी न जाने कहां गुम हो गए। उत्खनन वालों को मेरा पता जरूर चल गया। मैंने सुना है कि खनन का कारोबार करने वाले राजधानी के हैं। डंपरों की कहानी भी यही कहती है। खनन करने वालों का खौफ इतना ज्यादा है कि छोटा-मोटा किसान तो उनका विरोध ही नहीं कर पाता। ग्राम बरडुंआ की भागवती देवी की स्थिति देखकर तो मुझे दया आती है। उसके खेत के पास ही खनन करने वाली शिवा कारपोरेशन ने रेत निकालने के लिए 20 फिट गहरे तक गड्डा कर दिया है। जबलपुर में भी कुछ राजकृपा प्राप्त लोग ही रेत निकाल रहे हैं। जबलपुर में लाखों घन मीटर रेत निकाली जा चुकी है।
अवैध रेत उत्खनन को रोकने के सरकार की तरफ से भले ही कई दावे किए जा रहे हों, लेकिन इसकी वास्तविकता को भी नकारा नहीं जा सकता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कई मंचों से यह घोषणा कर चुके हैं मेरे अंदर से अब रेत का अवैध उत्खनन नहीं होने दिया जाएगा, बावजूद इसके अवैध रेत का उत्खनन नहीं रोका जा सका है। प्रदेश के अन्य जिलों की अपेक्षा सबसे ज्यादा रेत का उत्खनन खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सीहोर में किया जा रहा है। इसके अलावा मंडला, अनूपपुर, होशंगाबाद, हरदा जिलों में भी जमकर मुझसे रेत निकाली जा रही है।

 

पिछले दो सालों में ये आंकड़ा दोगुना हो चुका है। दूसरी तरफ अवैध खनन को लेकर जितने मामले प्रदेश की अदालतों में हैं, उतने अन्य किसी राज्य में नहीं हैं। यह खुलासा कोल मंत्रालय की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो सालों में अवैध खनन करने वालों ने 9 अरब 32 करोड़ 35 लाख रुपए का गौण (रेत, गिट्टी, मुरम) और प्रमुख खनिज (मैग्नीज, बाक्साइड, कॉपर) निकाल लिया है। हालांकि परिवहन के दौरान ये पकड़े गए।

 

मध्यप्रदेश में खदानों के लिए 406 पट्टे आवंटित हैं, लेकिन अवैध खनन की स्थिति यह है कि वर्ष 2015-16 में 13 हजार 627 मामले सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014-15 में मध्यप्रदेश में अवैध खनन कारोबारियों ने जहां 8 लाख 30 हजार 638 क्यूबिक मीटर गौण खनिज की चोरी की, वहीं 36 हजार 877 क्यूबिक मीटर प्रमुख खनिज चुराया। वर्ष 2015-16 में चोरी किए गए खनिज की मात्रा की जानकारी प्रदेश ने खान मंत्रालय को नहीं दी, सिर्फ राशि बताई।
अवैध खनन के परिवहन के दौरान पिछले तीन सालों में 28 हजार 525 मामले सामने आए, जिसमें एक अरब 66 करोड़ 71 लाख रुपए का जुर्माना वसूला गया। वहीं अवैध परिवहन में लगे 528 वाहन भी जब्त किए गए और 60 मामलों की एफआईआर दर्ज की गई। मध्यप्रदेश में चल रहे अवैध खनन को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भी सरकार पर कई बार हमला किया, लेकिन इसका भी कोई असर सरकार पर नहीं पड़ा।

 

कांग्रेस का कहना है कि शिवराज सिंह 11 सालों में प्रदेश में खेती को तो लाभ का धंधा नहीं बना पाए लेकिन उन्होंने रेती (रेत) को लाभ का धंधा जरूर बना दिया है। अब कांग्रेस जरूर मेरे बचाव में आई है, लेकिन जब कांग्रेस सत्ता में थी तो इन्होंने भी मेरा जमकर दोहन किया और इनके कर्ता-धर्ता मालामाल बन गए। कांग्रेस ने मेरा बचाव करते हुए कहा कि रेत का अवैध परिवहन करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भतीजे, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य सूर्यप्रकाश मीणा के करीबी रिश्तेदार तथा अन्य नेताओं के करीब एक दर्जन डंपर पकड़े गए हैं। इनके अलावा प्रदेश के कई अन्य जिलों से भी लगातार अवैध खनन की शिकायतें आ रही हैं।
मेरी घाटी में जंगल तीन प्रजातियों में बंटा हुआ है। साल, सागौन और मिश्रित वन। इन क्षेत्रों में साल प्रजाति के वृक्षों की अधिकता है। उन्हें साल वन की श्रेणी में रखा गया है। जहां सागौन ज्यादा है उसे सागौन का जंगल कहा जाता है। पश्चिमी क्षेत्र में सागौन है। जंगल कम हो रहे हैं, लेकिन आबादी का दबाव बढ़ रहा है। पिछले दो दशकों में लगभग तीस प्रतिशत आबादी का दबाव बढ़ गया है। इसका सीधा असर मेरी सेहत पर पड़ा है। हां एक बात तो मैं बताना भूल ही गई थी, मेरी सेहत खराब है इसका सार्वजनिक तौर पर विवरण सांसद प्रहलाद पटेल द्वारा रखा गया था। उनके भाई विधायक जालम सिंह के बारे में लोग मुझे बताते रहते हैं कि वे भी रेत का उत्खनन करा रहे हैं। मैंने तो अब खामोशी ओड़ ली है। वैसे भी मेरी सिर्फ कल-कल सुनाई देती है। कल-कल के स्वरों को शब्दों के रूप में पिरोकर कोई मेरी अभिव्यक्ति महसूस नहीं कर पाता।

 

परक्कमा वासी की नियति तो झाबुआ-अलीराजपुर जिले के दशाणा और कष्टा में लुटना है। परक्कमा वासी के तन पर कपड़े ही इस पड़ाव पर बचते हैं बाकी तो सब भील, आदिवासी लूट लेते हैं। हां वे भूखे परक्कमावासी को भोजन कराने की कृपा भी करते हैं। रेत के सौदागर तो कृपा की राह पर ही नहीं है। वे तो सिर्फ प्राकृतिक संपदा के शोषण में जुटे हुए हैं। कई बार मेरे सब्र का पैमाना झलक उठता है। मैं तटों को तोड़कर उग्र रूप भी ले लेती हूं। इस उम्मीद में कि शायद मेरे महत्व और जरूरत को समझा जाएगा। फिर मैं सामान्य हो जाती हूं। मर्यादा में रहना मेरा स्वभाव है। भले ही इंसान अमर्यादित आचरण कर रहा हो, मर्यादा में रहने का महादेव का आदेश जो है। आधुनिक युग के शिव शायद मेरी विडंवना महसूस न कर पाए हों। दुनिया में जब पानी के लिए युद्ध हो रहा होगा तब शायद लोग प्रायश्ति के लिए मेरे पास आएंगे। संभव है कि मेरे आंचल में इतना जल भी न हो कि मैं उनको पापमुक्त कर सकूं।

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