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बिना मुस्कान आनंद कैसा!

मध्यप्रदेश सरकार राज्य में आनंद विभाग (हैप्पीनेस डिपार्टमेंट) का गठन करने जा रही है। विभाग के गठन की घोषणा के बाद माननीय मुख्यमंत्री जी ने अपने ब्लॉग पर लिखा कि आज तमाम सुख सुविधाओं के बाद भी लोगों में आनंद नहीं है। इंसान अवसाद, हिंसा, निराशा और आत्महत्या के बवंडर में घिरता जा रहा है। मुख्यमंत्री जी की चिंता तो वाजिब है, पर यह आधी सच्चाई है। अगर सिर्फ मध्य प्रदेश की बात करें तो आत्महत्या करने वालों में धन-धान्य और सुविधा संपन्न लोगों के मुकाबले गरीब, असहाय, बेरोजगार, प्रताड़ित और सपनों के रौंदे जाने से दुखी लोगोंं (बच्चे, किसान, युवा) की संख्या कहीं ज्यादा है। यानि जिम्मेदार कंधे ही जिम्मेदारी का बोझ नहीं उठा पा रहे हैं। निराशा और अवसाद का जीवन भी वही जी रहे हैं, जिनकी आमदनी खर्च से कम है। बचपन से एक कहावत सुनते आ रहे हैं भूखे भजन न होय गोपाला… आदि काल से यह लाइन अपने आपको प्रमाणित करती आई है, लेकिन मौजूदा परिवेश में इसका अर्थ और व्यापक हो गया है।

आज के शब्दों में इसकी परिभाषा है अगर आपके पास पैसा नहीं है तो आपको जीने का हक नहीं है। यह एक कड़वी सच्चाई है। मुख्यमंत्री जी सही कह रहे हैं, जमाना बदल रहा है, सुविधाओं का विस्तार हो रहा है, आमदनी बढ़ रही है, लेकिन सभी के लिए नहीं। प्रदेश की आधी जवानी तो अभी भी दो वक्त की रोटी कमाते-कमते ही बूढ़ी हो जाती है। एक आम आदमी अपने पूरे जीवनकाल में बच्चों और परिवार को खुशियां देने का सिर्फ और सिर्फ वादा कर पाता है। चेहरे पर जब मुस्कान ही नहीं है तो आनंद कहां से आएगा। अगर आनंद लाने की मंशा सच में है तो पहले चेहरे पर मुस्कान लाइए। जो कुछ भी चल रहा है उसे दुरुस्त करिए। कुछ खास तरह के लोगों के बीच खुशियां लुटाने के बजाय बड़ी आबादी के बीच इसे बांटने का बीड़ा उठाइए। सबसे पहले तो श्रम कानूनों में सुधार करने की जरूरत है, जिसे आपकी पार्टी और कमजोर करने पर तुली हुई है। अगर पत्रकारों की ही बात करें तो हमारे देश के श्रम कानूनों में उनको कई तरह के अधिकार दिए गए हैं, लेकिन मिल एक भी नहीं पाता है। किसी भी मीडिया संस्थान में श्रम कानून और वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 का पालन नहीं होता है। आपकी सरकार और श्रम विभाग ने आज तक यह जानने की कोशिश भी नहीं की।

 

पत्रकारों से 10-10 घंटे काम कराया जाता है और मिलता है पारिश्रमिक, क्योंकि जितने रुपए मिलते हैं उसको वेतन नहीं कहा जा सकता। श्रम विभाग में कोई शिकायत पहुंचती भी है तो मामला ले-देकर निपटा दिया जाता है। शिकायतों का समय पर निराकरण नहीं हो पाता और कर्मचारी को नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। वह दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो जाता है। अकेला पत्रकार ही नहीं कमोबेश हर प्राइवेट कर्मचारी की यही ब्यथा है। मुख्यमंत्रीजी लोगों को घोषणाएं, वादे और 56 इंच का सीना नहीं चाहिए, उनको अपना हक चाहिए, क्योंकि इसी से उनके चेहरे पर मुस्कान और परिवार में खुशियां आएंगी। फिर जो आनंद आएगा उसको मापने, पहचानने और परिभाषित करने के लिए न तो किसी विभाग की जरूरत पड़ेगी और न ही आनंद का प्रसार बढ़ाने की दिशा में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय, नीति निर्धारण और क्रियान्वयन के नाम पर पैसे बर्बाद होंगे। बस! सही और सख्त कदम उठाइए, आनंद अपने आप आएगा।

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