Breaking News
Home / संपादकीय / नौकरशाह, शासक नहीं है

नौकरशाह, शासक नहीं है

देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता शासन चलाने के लिए अपना प्रतिनिधि चुनती है। जनता के प्रति जवाबदेह भी चुना हुआ प्रतिनिधि है। संविधा

न में नौकरशाह की भूमिका पूरी तरह से स्पष्ट है। उसे नियम और कानून के मुताबिक आदेशों का क्रियान्वयन करना होता है। नौकरशाह सरकार नहीं है। सरकार तो चुने हुए प्रतिनिधि है। मुख्यमंत्री और उनका मंत्रिमंडल है। सारी शक्तियां राज्यपाल में समाहित है। सरकार, राज्यपाल के नाम से ही चलाई जाती है। नियम-कानून बनाने के बाद उन्हें मंजूरी भी राज्यपाल ही देता है। मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल की जवाबदेही विधानसभा के प्रति है। हर चुनी हुई सरकार को यह अधिकार है कि वह संवैधानिक दायरे में रहते हुए जनहित को ध्यान में रखकर नियम-कानून बना सकती है उन्हें बदल सकती है अथवा संशोधित कर सकती है। कई मौकों पर यह देखा भी जाता है कि सरकार सार्वजनिक हित के लिए नियमों में परिवर्तन करती है। उद्योगपतियों के मामले में नीति और नियम तेजी से बदलते हैं। इस पर कोई भी टकराव मंत्रियों और नौकरशाहों के बीच नहीं होता है। राज्य के कर्तव्य और दायित्व आज इतने विस्तृत हो गए हैं कि इनको सम्पन्न करने के लिए विभिन्न बड़ी संस्थाएं अनिवार्य मानी जाती हैं।

विभिन्न आर्थिक राजनीतिक एवं व्यापारिक संस्थाएं अपने बडेÞ आकार के साथ ही उद्देश्यों की पूर्ति का प्रयास करती है। यह बड़ा आकार नौकरशाही का मूलभूत कारण है। वर्तमान समय में सरकार को हर प्रकार के कार्यों को इतने विस्तृत रूप में सम्पन्न करना पड़ता है कि वह सभी को प्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकती। यही कारण है कि नागरिकों और मंत्रियों के बीच एक नई प्रकार की मध्यस्थ शक्ति उदित हो गई है। यह शक्ति उन बाबुओं की है जो राज्य के लिए पूर्णत: अज्ञात होती हैं। ये लोग मंत्रियों के नाम पर बोलते और लिखते हैं तथा उन्हीं की तरह पूर्ण और निरपेक्ष शक्ति रखते हैं। यह अज्ञात रहने के कारण प्रत्येक प्रकार की जांच से बचे रहते हैं। सरकार में कोई भी आदेश मंत्री की प्रशासनिक मंजूरी के बगैर जारी नहीं हो सकता। हर सरकार में सरकार संचालन के कार्य नियम होते हैं। मंत्री और नौकरशाह दोनों ही इन कार्य नियमों से बंधे हुए होते हैं। देश में ऐसा कम ही सुनने में आता है कि किसी आईएएस अधिकारी के खिलाफ नाफरमानी की शिकायतों के चलते कोई दंडात्मक स्वरूप की कार्यवाही की गई हो। सामान्यत: आईएएस अधिकारियों के बारे में यह धारणा बनी हुई है कि वे अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हैं। इसके विपरीत राजनेताओं को भ्रष्ट माना जाता है। आम आदमी की बात सुनना चुने हुए प्रतिनिधि के कर्तव्य का हिस्सा है।

चुने हुए प्रतिनिधि के लिए ऐसे किसी स्थान पर जाकर बैठना मुश्किल होता है, जहां कि आम आदमी को आने-जाने की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो। नौकरशाह जिन आलीशन दफ्तरों में बैठते हैं, वहां तक पहुंचना दूरदराज के आदमी के लिए मुश्किल भरा और तकलीफदेह होता है। संवेदनशील प्रशासन की कल्पना नौकरशाहों के असंवेदनशील बर्ताव के कारण ही की जाती है। नौकरशाह फिर संवेदनशील नहीं बन पाए हैं। देश में चुने हुए प्रतिनिधि नहीं होते तो शायद नौकरशाह अंगे्रजों के बनाए कानून से आज भी देश में राज कर रहे होते। चुने हुए प्रतिनिधियों पर आज नौकरशाही हावी है तो इसकी बजह दलीय राजनीति है। प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति सबसे पहला काम यही करता है कि वह अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों के संवैधानिक अधिकारों को प्रशासनिक आदेशों, कभी-कभी मौखिक आदेशों के जरिए अधिक्रमित कर देता है। संदेश यह देने की कोशिश की जाती है कि मुख्यमंत्री को छोड़कर मंत्रिमंडल के सारे सदस्य भ्रष्ट हैं अथवा असंवैधानिक कृत्य कर रहे हैं। वास्तविकता में ऐसा होता नहीं है। प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के अंदर का असुरक्षा का भाव उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करता है। इसकी सलाह नौकरशाहों द्वारा ही दी जाती है। देश के नौकरशाह नहीं चाहते हैं कि चुने हुए प्रतिनिधि ही इस देश की सरकार को चलाएं। कानून और नियमों में वे इस तरह के संशोधन प्रस्तावित करते हैं, जिसमें कि अधिकार उनके हाथ में ही बने रहें। मंत्री अपने विभाग का प्रशासनिक मुखिया होता है। मंत्री पद ग्रहण करने के बाद उसकी संवैधानिक स्थिति लोक सेवक की होती है। विभाग के प्रशासनिक मुखिया होने के कारण हर सही गलत फैसले में उसकी नैतिक एवं संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है।

विभागीय मंत्री से औपचारिक मंजूरी लिए बगैर यदि किसी नौकरशाह द्वारा कोई आदेश जारी किया जाता है, तो उसे वैधानिक रूप से मान्य नहीं किया जाना चाहिए। बशर्ते विभागीय मंत्री द्वारा किसी वैधानिक आदेश द्वारा उसे किसी मामले के निराकरण के लिए अधिकृत न किया हो। देश के नौकरशाहों में विभागीय मंत्री के आदेशों एवं निर्देशों की अवहेलना या अनदेखा करने की प्रवृति काफी तेजी से बढ़ी है। परिपक्व लोकतंत्र में यह प्रवृति खतरनाक है। नौकरशाह भी इस देश के आम नागरिक की तरह ही हैसियत रखते हैं। सरकार में होने वाले भ्रष्टाचार एवं गलत निर्णयों का असर उन पर भी पड़ता है, लेकिन वे इस बात से अंजान रहते हैं। रिटायरमेन्ट के बाद वे अपने कार्यकाल की गलतियों को स्वीकार तो नहीं करते पर वर्तमान व्यवस्था की आलोचना जरूर करते हैं। जिस तरह से देश के राजनीतिज्ञों के बारे में कई फिल्में बनीं हैं, उसी तरह देश की नौकरशाही के रवैये को लेकर कई व्यंग्य और उपन्यास लिखे गए हैं। श्री लाल शुक्ला द्वारा लिखित राग दरबारी आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना कि दो दशक पहले था। पटवारी आज भी मुख्यमंत्री से ज्यादा ताकतवर है।

जमीनों के दस्तावेजीकरण का काम आज भी पूरी तरह से नौकरशाहों के हाथ में ही है। फिर भी पटवारी रिकार्ड उसकी व्यवस्था में सुधार नहीं हो पाया है। आम आदमी आज भी तहसील कार्यालय के सामने भटकता हुआ नजर आता है। नामांतरण के लिए सालों चक्कर लगाना पड़ते हैं। कई मामलों में आवेदक की मृत्यु भी हो जाती है। प्रशासन फिर भी संवदेनशील नहीं है। देश में नौकरशाही का जो रवैया है, उसमें अभी भी अंगे्रजीयत के अंश देखे जा सकते हैं। देश में यदि राजनेता नहीं होते तो आम आदमी सड़कों पर उतरकर नौकरशाहों के रवैया का प्रतिकार कर रहा होता। विभिन्न सरकारों द्वारा शुरू की गर्इं लोकप्रिय योजनाओं को अमलीजामा पहनाने का जिम्मा भी नौकरशाही के हाथ में होता है। योजना की शत-प्रतिशत सफलता भी नौकरशाही के रवैये पर ही निर्भर करती है। लेकिन देश में शायद ही कोई ऐसी योजना हो, जिसमें शत-प्रतिशत लक्ष्य को प्राप्त कर लिया गया हो? संविधान के 73वें एवं 74वें संशोधन के जरिए स्थानीय निकायों के जरिए मोहल्ला और चौपाल में ही फैसले कर हितग्राहियों के चयन की जिम्मेदारी तय की गई थी। पंचायती राज व्यवस्था को लागू हुए भी दो दशक से अधिक का वक्त गुजर चुका है। संविधान की भावना के अनुरूप पंचायतों को जो अधिकार सौंपे गए, वे नौकरशाहों ने छिन लिए हैं। चुने हुए जन प्रतिनिधि सिर्फ लानत सहने का तंत्र मात्र बनकर रह गया। जबकि वे जवाबदेह हैं, सरकार हैं।

About admin

Check Also

मदारी की कलाकारी नहीं अपनी जेब पर नजर बनाए रखिए

भारत विविधताओं से भरा देश है। यहां नाम और व्यवसाय का उपयोग भी उपमा के …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *