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कार्यवाही में कम, बचाने में अधिक दिलचस्पी लेती है सरकार 

मध्यप्रदेश विधानसभा के हाल ही में समाप्त हुए  मानूसन सत्र में आदिम जाति कल्याण  विभाग में एक अधिकारी द्वारा किए गए भ्रष्टाचार से संबंधित सवाल पर जब सरकार घिर गई तो राज्यमंत्री लाल सिंह आर्य ने अपना बचाव यह कह कर किया कि उन्हें विभाग का प्रभार लिए कुछ समय ही हुआ है,लिहाजा जवाब के लिए और वक्त दिया जाना चाहिए। मामला 68 करोड़ रूपए के घोटाले के बारे में था। घोटाला की जांच एक नहीं कई एजेंसियों ने की। प्रशासनिक जांच भी हुई। छात्रवृति के इस घोटाले में लगभग दो वर्ष पूर्व तत्कालीन मुख्य सचिव अन्टोनी  डिसा ने प्रकरण में आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश आदिम जाति कल्याण विभाग को दिए थे। विभाग ने मुख्य सचिव के निेर्देशों पर भी कार्यवाही नहीं की। विधानसभा में जब सवाल आया  तो मंत्री ने कार्यवाही करने में अपनी विवशता को अपने अल्प कार्यकाल की चादर उठा दी। यहां आदिम जाति कल्याण विभाग के मामले का उदाहरण एमके सिंह के कारण दिया जा रहा है। 1985 बैच के आईएएस एमके सिंह। इन्हें सरकार ने खराब सर्विस रिकार्ड के कारण अनिवार्य सेवानिवृति दे दी है। एमके सिंह भी आदिम जाति कल्याण विभाग में आयुक्त रहे हैं। वे वर्ष 2005 में आयुक्त थे। लाल सिंह आर्य के नाम का उदाहरण देने की दूसरी वजह उनका सामान्य प्रशासन विभाग का राज्य मंत्री भी होना है। सामान्य प्रशासन विभाग ही वह विभाग है,जिसने अधिकारियों एवं कर्मचारियों के सेवा रिकार्ड की नियमित समीक्षा करने के नियम बनाए हैं। लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो और विभागीय जांच आयुक्त भी इसी विभाग के अधीन स्वतंत्र रूप से काम करता है। यह पद भी अब दोहरे प्रभार में चल रहा है। यहां भ्रष्टाचार के मामले में सरकार की नीयत पर सवाल खड़े होते हैं। विभागीय जांच आयुक्त यदि सीधे मुख्य सचिव कार्यालय में काम कर रहा है तो कहीं न कहीं इसका प्रभाव भी जांच पर पड़ सकता है। सरकार आजकल ज्यादतर मामले जांच के लिए विभागीय जांच आयुक्त को ही भेज रही है।
आईएएस और डिप्टी कलेक्टरों से जुड़े सभी तरह के मामले सामान्य प्रशासनिक विभाग के ही अधिकार क्षेत्र में आते हैं। विभाग ने ही राज्य शिक्षा केन्द्र की खरीदी से जुड़ी विभागीय जांच में एमके सिंह को पदावनत करने का फैसला लिया था। एमके सिंह के बैच के सभी अधिकारी अपर मुख्य सचिव बन चुके हैं। एमके सिंह सचिव के वेतनमान ही कार्यरत थे।  जांच रिपोर्ट के आधार पर  सिंह को पदावनत कर अपर सचिव के वेतनमान में लाना था। लेकिन, सरकार ने अपने निर्णय को ही लागू नहीं किया।  एमके सिंह को अनिवार्य सेवानिवृति दिए जाने से यह संदेश तो साफ चला ही गया कि सरकार की नीति और नीयत में खोट नहीं है। रंग चोखा आ गया। लगातार तीसरी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जीरो टालरेंस की नीति का एलान किया था। खराब सर्विस रिकार्ड वाले शासकीय सेवकों को बाहर का रास्ता दिखाने के वादे भी किए गए थे। मध्यप्रदेश में पचास साल की उम्र और बीस साल की नौकरी पूरी कर चुके शासकीय सेवकों के कामकाज की समीक्षा का प्रावधान नियमों में है। सरकार इस प्रावधान में अपनी सुविधा के अनुसार बदलाव भी करती रहती है। जब जीरो टालरेंस का मामला चला तो कुछ विभागों के अधिकारियों, कर्मचारियों के रिकार्ड जांचे गए। लेकिन, खराब रिकार्ड वालों की पहचान नहीं हो पाई। अधिकारियों एवं कर्मचारियों के रिकार्ड को जांचने का विश्वसनीय मापदंड सिर्फ गोपनीय चरित्रावली को ही माना जाता है। ज्यादतर मामलों में सीआर लिखने वाला अधिकारी उदारतापूर्ण रवैया अपनाता है। जहां सीआर बिगड़ने का खतरा होता है, वहां अधीनस्थ अमला स्व आकलन प्रतिवेदन ही प्रस्तुत नहीं करता।  जहां तक सवाल भ्रष्टाचार के मामलों में कार्यवाही का है, तो सरकार के कायदे-कानून लोक लुभावने है। मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों ने भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति राजसात करने का भी कानून बनाया है। संपत्ति भी राजसात की गई। पर  भ्रष्टाचार के मामलों में कमी नहीं आई। दरअसल, सरकार खुद ही अपने बनाए कानून को कमजोर करने का काम भी समांतर रूप से करती रहती है। सरकार ने ही यह तय कर रखा है कि लोकायुक्त के ट्रेप केस में यदि एक वर्ष में कोर्ट से फैसला नहीं आता तो निलंबित अधिकारी को बहाल कर दिया जाए। लोकायुक्त जांच में दोषी  पाए गए अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही का फैसला मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडल की समिति करती है। समिति की बैठकें भी नियमित तौर पर नहीं होती हैं। सरकार भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने के लिए कितनी गंभीर है,इसका अंदाजा लोकायुक्त के खाली पद से लगाया जा सकता है। लोकायुक्त का पद प्रभार में चल रहा है। भ्रष्टाचार की जांच करने वाली दूसरी एजेंसी आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो है। किसी दौर में पुलिस अफसर इन दोनों एजेंसियों में पदस्थापना को लूपलाइन मानते थे। अब स्थितियां बदल गई हैं। हाल ही में हरदा के कलेक्टर अनय द्विवेदी ने ईओडब्ल्यू पर सवाल खड़े किए हैं। सरकार का सरकारी अधिकारियों के प्रति नजरिया भी बदला है। पदस्थापना के मामले में मैरिट को दरकिनार कर दिया गया है। सरकार का पूरा जोर भ्रष्टाचार से घिरे अफसरों को दंडित करने के बजाए ईनाम देने पर है। अफसरों को  ईनाम देने की  तमाम योजनाएं सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं। ईनामी  योजनाओं से ऐसा लगता है कि अफसरों ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर सरकार को उपकृत कर दिया हो? राजे-रजवाड़ों के दौर में इस तरह की परंपरा थी। अंग्रेज अपने अफसरों को निष्ठा का ईनाम दिया करते थे।
अफसर आज भी इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि वे सरकार नहीं हैं। संवैधानिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही सरकार हैं। चुने हुए प्रतिनिधियों के मन में भी अफसरों को रूतबा और खौफ नजर आता है। भय यह रहता है कि यदि अफसरों के खिलाफ कुछ किया तो वे अंग्रेजों  की  तरह व्यवहार करने लगेगें। मंदसौर में गोलीकांड में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला। अफसरों ने कमजोरी छुपाने के लिए आंदोलनकारियों को अफीम का तस्कर तक बता दिया? पेटलावद के हादसे में किसी की जिम्मेदारी भी तय नहीं की गई। आईएएस रमेश थेटे का मामला भी एमके सिंह की श्रेणी में ही आता है।  सरकार कथित राजनीतिक नुकसान के डर से फैसला नहीं लेना चाहती। एमके सिंह को अनिवार्य सेवानिवृति दिए जाने उनकी सेहत पर कोई खास असर पड़ना नहीं है। एक सामान्य रिटायर्ड अफसर को जो लाभ मिलते हैं, वे उन्हें भी मिलेंगे। बर्खास्त करते तो ही कार्यवाही सख्त मानी जाती।  अनिवार्य सेवानिवृति तो सिर्फ कठोर कार्यवाही से बचाने का तरीका भर है।
साभार सुबह सवेरे  राग दरबारी

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