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ज्योति धुर्वे- आफत गले पड़ी - मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चाहे तो सरकार की पारदर्शी और निष्पक्ष कार्यशैली पर अपनी पीठ एक बार फिर थपथपा सकते हैं। इस बार पीठ थपथपाने का मौक
ज्योति धुर्वे- आफत गले पड़ी - मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चाहे तो सरकार की पारदर्शी और निष्पक्ष कार्यशैली पर अपनी पीठ एक बार फिर थपथपा सकते हैं। इस बार पीठ थपथपाने का मौक

आफत गले पड़ी

आफत गले पड़ी

 

पावर गैलरी ब्यूरो:

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चाहे तो सरकार की पारदर्शी और निष्पक्ष कार्यशैली पर अपनी पीठ एक बार फिर थपथपा सकते हैं। इस बार पीठ थपथपाने का मौका राज्य के आदिवासी विकास विभाग ने दिया है। आदिवासी विकास विभाग की संदिग्ध जाति प्रमाण पत्रों को जांच करने वाली समिति ने बैतूल की सांसद ज्योति धुर्वे के जाति प्रमाण पत्र को सही नहीं माना है। विभाग के इस फैसले पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पीठ थपथपाने की मुद्रा में नहीं हैं। उनकी त्यौंरियां चढ़ी हुर्इं हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी सरकार के एक विभाग के फैसले को किस रूप में लें? ज्योति धुर्वे से सांसद पद छोड़ने के लिए कहें या फिर विभाग की आयुक्त दीपाली रस्तोगी के खिलाफ कार्यवाही करें?
मामला राजनीतिक होने के साथ आदिवासी जाति के दुरूपयोग का संवेदनशील भी है। इस मामले में वे दीपाली रस्तोगी के खिलाफ कोई कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं। ज्योति धुर्वे से इस्तीफा कराने का मतलब यह है कि एक लोकसभा के उपचुनाव कराना।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अब इस स्थिति में नहीं हैं कि एक और लोकसभा का उप चुनाव कराए। जाहिर है कि ऐसे में ज्योति धुर्वे को कानूनी रास्ता अपनाने के लिए पार्टी कहेगी। ज्योति धुर्वे इस फैसले से हतप्रभ हैं।

बैतूल-हरदा संसदीय क्षेत्र से वर्ष 2009 में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़कर जीतने वाली ज्योति धुर्वे के आदिवासी न होने का आरोप लगाते हुए उनके प्रतिद्वंदी कांग्रेस उम्मीदवार ओझाराम इवने और निर्दलीय उम्मीदवार अधिवक्ता शंकर पेंद्राम ने उच्च न्यायालय में अलग-अलग याचिका दायर की थी। अधिवक्ता शंकर पेन्द्राम ने उच्च स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष 30 मई 2009 को शिकायत कर जांच और कार्रवाई करने की मांग की थी।

उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान ओझाराम इवने का निधन हो गया, जिससे उनके द्वारा दायर की गई याचिका खारिज हो गई। 18 जुलाई 2014 को अधिवक्ता शंकर पेन्द्राम के द्वारा दायर की गई याचिका भी हाईकोर्ट जबलपुर की सिंगल बेंच के जस्टिस जीएस सोलंकी ने खारिज कर दी थी। उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद जाति प्रमाण-पत्र को निरस्त करने का निर्णय दिया है।
सांसद ज्योति धुर्वे के जाति प्रमाण-पत्र को फर्जी बताते हुए कार्रवाई कराने पिछले 8 वर्षों से लड़ाई लड़ रहे अधिवक्ता शंकर पेन्द्राम कहते हैं कि ज्योति धुर्वे ने दो बार आदिवासियों का हक छीनने का काम किया है। श्रीमती धुर्वे ने अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष पद पर गैर आदिवासी होते हुए काबिज रहकर आदिवासी वर्ग का हक छीना। इसके बाद उस पद से इस्तीफा देकर लोकसभा के लिए आदिवासी वर्ग की आरक्षित सीट से चुनाव लड़कर दोबारा हक छीनने का काम किया।
सांसद धुर्वे का जाति प्रमाण-पत्र गलत होने का आदेश जारी होने के बाद बैतूल जिले की राजनीति में बड़े परिवर्तन की संभावनाएं बढ़ गई हैं। कांगे्रस भी सक्रिय हो गई है। जिला कांगे्रस कमेटी के अध्यक्ष समीर खान कहते हैं कि सांसद ज्योति धुर्वे के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जानी चाहिए। पूरे आदिवासी समाज से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को माफी मांगनी चाहिए।

इधर, भाजपा चुप है बैतूल के जिला भाजपा के अध्यक्ष जीतेन्द्र कपूर बचाव की मुद्रा में कहते हैं कि छानबीन समिति के निर्णय की जानकारी हमें अभी अधिकृत रूप से नहीं मिली है। छानबीन समिति उच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देगी और उसके बाद न्यायालय जो निर्णय देगा वह मान्य होगा। अभी कुछ भी कहना बेहद जल्दबाजी होगी, हमें इंतजार करना चाहिए।

कैसे फर्जी है जाति प्रमाण-पत्र

आदिवासी विकास विभाग द्वारा सांसद ज्योति धुर्वे का जाति प्रमाण-पत्र संदिग्ध होने का जो आदेश जारी किया है, उसमें ग्यारह बिंदुओं पर फोकस किया गया है। ज्योति धुर्वे का जाति प्रमाण-पत्र 21 अगस्त 1984 को गुटियारी तहसील रायपुर जिला रायपुर से जारी हुआ था। मामले की शिकायत के बाद पुलिस द्वारा की गई जांच में बताया गया कि ज्योति धुर्वे के पिता महादेव दशरथ रेलवे में कर्मचारी थे। उनके सर्विस रिकार्ड में जाति का कॉलम खाली है और स्थायी पता ग्राम तिरोड़ी, रेलवे स्टेशन तिरोड़ी बालाघाट (मध्यप्रदेश) लिखा हुआ है। बैतूल पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट के अनुसार ज्योति धुर्वे ने वर्ष 1983 में हायर सेकेण्ड्री परीक्षा पास की थी।

इस परीक्षा की मार्कशीट की जो फोटो कॉपी सांसद धुर्वे द्वारा उपलब्ध कराई गई उसमें जाति गोंड लिखी हुई है। छानबीन समिति ने जांच में यह पाया कि अंकसूची में जाति का कॉलम नहीं होता है। विभाग ने आदेश में लिखा कि सांसद की मार्कशीट में नाम के साथ गोंड लिखा हुआ है। शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच के आधार पर समिति ने पाया कि सांसद के पिता वर्ष 1960 के पूर्व बालाघाट के ग्राम तिरोड़ी में वर्ष 1960 तक रहे। उसके बाद रेलवे की नौकरी करने रायपुर चले गए। रिपोर्ट के अनुसार तिरोड़ी गांव में महादेव वल्द दशरथ जाति पंवार नाम का अन्य कोई व्यक्ति निवास नहीं करता है। ग्राम पंचायत तिरोड़ी ने इसकी पुष्टि पत्र के जरिए की।
सांसद ज्योति धुर्वे ने मामले की सुनवाई के वक्त छानबीन समिति के समक्ष कहा था कि उनके पिता एवं दादा भूमिहीन थे। आदिवासी विकास विभाग की जांच में यह तथ्य सामने आया कि ग्राम तिरोड़ी से लगी खरपड़िया में पटवारी हल्का नंबर 05 राजस्व निरीक्षक तिरोड़ी तहसील कटंगी में खसरा नंबर 234/1च,234/16,234/2,259/1ख जिसमें रकबा 0.802 हीरालाल, महादेव, मुकुंदलाल वल्द दशरथ, केशो, कलाराम वल्द जगन्नाथ, सेवंत बेवा जगन्नाथ जाति पंवार, साकिन तिरोडी हक भूमि स्वामी होलु वल्द रामा धुपन बेवा रामा के नाम भूमि स्वामी के तौर पर दर्ज है।

 

शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत पांच साला खसरे को समिति ने रिकार्ड पर लिया। इस खसरे में भी ज्योति धुर्वे की पिता की जाति पंवार लिखी है। दिलचस्प यह है कि समिति के समक्ष ज्योति धुर्वे ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकीं, जिससे उनके गोंड आदिवासी होने की पुष्टि होती हो। ज्योति धुर्वे ने जो साक्ष्य प्रस्तुत किए वे या तो उनकी माता पक्ष के थे अथवा पति पक्ष के।

जाति प्रमाण पत्रों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के साफ निर्देश हैं कि जो व्यक्ति संवैधानिक आरक्षण का लाभ ले रहा है, वह समुदाय का ही है इसे साबित करने की जिम्मेदारी भी लाभ लेने वाले की है। आयुक्त आदिवासी विभाग दीपाली रस्तोगी ने बैतूल से जारी जाति प्रमाण-पत्र को निरस्त कर उसे राजसात करने का आदेश दिया है।
यह दूसरा मौका है जबकि आईएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी के कारण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को खून का घूंट पीकर चुप रहना पड़ा। सत्ताधारी दल के एक सांसद का जाति प्रमाण-पत्र को संदेहास्पद बताकर उसे राजसात करने का आदेश जारी करने से पूर्व दीपाली रस्तोगी ने इस पूरे मामले की जानकारी मुख्यमंत्री अथवा मुख्य सचिव को भी देना जरूरी नहीं समझी। आदेश सीधे बेवसाइट पर डाल दिया गया।

बताया जाता है कि विभाग के प्रमुख सचिव अशोक शाह ने भी पूरे घटनाक्रम की जानकारी मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह को नहीं दी। प्रशासन में एक मान्य परंपरा है कि किसी भी राजनीतिज्ञ के बारे में किसी तरह का आदेश जारी करने से पूर्व एक बार उच्च राजनीतिक स्तर के ध्यान में जरूर लाया जाता है। आदिम जाति कल्याण विभाग में इन दिनों राम-राज्य है। मंत्री ज्ञान सिंह विभाग में कुछ ही दिनों के मेहमान हैं।

उनका पूरा ध्यान अपने निजी हितों पर है। विभाग के प्रमुख सचिव अशोक शाह उसी कॉक्स की गिरफ्त में है, जो कि कई गंभीर घोटालों के जनक हैं। विभाग की आयुक्त दीपाली रस्तोगी वही करती हैं, जो उन्हें सही लगता है।

संभवत: इसी कारण उन्हें एक समाचार पत्र में लेख लिखकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान पर भी सवाल खड़े किए थे। दीपाली रस्तोगी इससे पूर्व सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लेकर भी लेख लिख चुकी हैं। स्वच्छता अभियान पर लिखे गए लेख के कारण सरकार ने उनसे जवाब तलब भी किया है।

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