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आखिर शिवराज को गुस्सा क्यों आ रहा है? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गुस्से में हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में उनकी नाराजगी के कारण तलाश
आखिर शिवराज को गुस्सा क्यों आ रहा है? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गुस्से में हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में उनकी नाराजगी के कारण तलाश

आखिर शिवराज को गुस्सा क्यों आ रहा है?

आखिर शिवराज को गुस्सा क्यों आ रहा है?

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गुस्से में हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में उनकी नाराजगी के कारण तलाशने पर भी नहीं मिल रहे हैं। भोपाल में सिविल सर्विस डे के कार्यक्रम से लेकर मोहनखेड़ा में आयोजित भाजपा की कार्यसमिति तक सिर्फ मुख्यमंत्री की नाराजगी ही लोगों ने सुनी। आखिर मुख्यमंत्री उबाल क्यों खा रहे हैं। लगातार बारह साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे शिवराज सिंह चौहान के हाथ से प्रशासनिक और राजनीतिक पकड़ रेत की तरह फिसलती जा रही है। मुख्यमंत्री नर्मदा की परिक्रमा कर शास्त्रानुसार मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर चल रहे हैं। दूसरी और उसी नर्मदा के पानी में रेत माफिया के साथ उनके परिजन खड़े नजर आ रहे हैं। नर्मदा यात्रा का प्रतिफल शायद उन्हें मिल नहीं पा रहा है। संभवत: इसी कारण वे अफसरों और मंत्रियों पर उबल रहे हैं। बारह दिन के मुख्यमंत्री होते तो शायद लोग उनकी नाराजगी में अर्थ भी तलाश लेते, लेकिन वे बारह साल के मुख्यमंत्री हैं। प्रशासनिक और राजनीतिक जमावट उनके ही कर कमलों से हुई है। अफसरों और मंत्रियों की जिम्मेदारी उन्होंने ही तय की है। शिवराज सिंह चौहान की यश और कीर्ति का गुणगान गली-गली में हो रहा है। उनका कद इतना ऊंचा हो गया है कि कोई उनके बराबर खड़ा ही नजर नहीं आता। करीबी से करीबी माने जाने वाले अफसर भी उनसे एकांत में दो मिनट बात करने का समय भी नहीं ले सकते हैं। अफसर तो फिर भी जैसे-तैसे अपना काम चला लेते हैं, दिक्कत तो मंत्रियों को हो रही है। अफसर काम नहीं कर रहे हैं, यह सुनने का समय भी मुख्यमंत्री के पास नहीं है। उल्टे वे मुख्यमंत्री की ओर से मिलने वाली लानतों पर मुंह छुपाने के लिए मजबूर हैं?

सिर्फ दो अनमोल रत्न

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास दो अनमोल रत्न हैं। एक गृह एवं परिवहन मंत्री भूपेन्द्र सिंह और दूसरे हैं लोक निर्माण मंत्री रामपाल सिंह। इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में परिवहन विभाग है। विभाग के बेरियर पर गैर सरकारी कर्मचारियों की तैनती का मामला हो या फिर रूटेशन के आधार पर तैनाती का। विभाग की बदनामी इन दो कारणों से ही है। बसों की ओवर लोडिंग के मामले का हम यहां जिक्र नहीं कर रहे हैं। दूसरे रत्न रामपाल सिंह हैं। विभाग में उनकी चले इसकी कोशिश वे पीडब्ल्यूडी मंत्री बनने के बाद से ही कर रहे हैं। विभाग के मंत्री वे जरूर हैं लेकिन सड़क विकास निगम के चेयरमैन मुख्यमंत्री हैं, इस कारण विभाग में उनके पास तबादले-पोस्टिंग के अलावा कोई काम नहीं है।

 

तबादलों में भी प्रमुख सचिव प्रमोद अग्रवाल उनकी नहीं चलने देते। मुख्यमंत्री के करीबी मंत्रियों की यह स्थिति है तो दूसरों की बात ही क्या है। दूसरों के हाल तो और भी खराब हैं। खैर, इसके बाद रामपाल सिंह की अपने नेता के प्रति स्वामी भक्ति में कोई कमी दिखाई नहीं देती। पंचायत सचिवों की हड़ताल हो या फिर पटवारियों की हर जगह समझौता कराने की कोशिश करने वालों में उनका ही नाम प्रमुखता से आता है। ये बात और है कि न तो वे पटवारी की हड़ताल खत्म करा सके और न ही पंचायत सचिवों की। मजबूरी में मुख्यमंत्री को वेतन काटने की धमकी का बयान देना पड़ा। भाजपा की अंदरूनी राजनीति की चर्चाओं पर गौर किया जाए तो भूपेन्द्र सिंह और रामपाल सिंह का नाम शिवराज सिंह चौहान के विकल्प के तौर लिया जाता है।

क्या शिवराज सिंह चौहान 2018 के नायक होंगे

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी का चाल, चरित्र और चेहर पूरी तरह बदल चुका है। नरेन्द्र मोदी के सिर पर उत्तरप्रदेश की ऐतिहासिक जीत का सेहर बंधा हुआ है। पार्टी वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है। मोदी हर हाल में अपनी सत्ता बरकरार रखना चाहते हैं। लोकसभा चुनाव के पहले वर्ष 2018 में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव भी होना है। जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होना है, उनमें मध्यप्रदेश भी एक है। राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सिर लगातार दो विधानसभा के चुनाव जिताने की उपलब्धि है। वे पिछले बारह साल से मुख्यमंत्री हैं। इसके बाद भी उनकी प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

 

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही यह अफवाहें चल रही हैं कि शिवराज सिंह चौहान की जिम्मेदारियों में बड़ा बदलाव किया जा सकता है। उत्तरप्रदेश के चुनाव नतीजों के बाद इन अफवाहों के पर उग आए हैं। चुनाव नतीजों के बाद ही शिवराज सिंह चौहान का गुस्सा भी सार्वजनिक तौर पर उजागर हो रहा है। इस गुस्से के कारण ही लोग जिम्मेदारियों में बदलाव की अटकलें लगा रहे हैं। सामान्य राजनीतिक स्थिति पर गौर करें तो शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ ऐसा कुछ नहीं है, जिसके कारण बदलाव जरूरी हो। नया नेता आने का मतलब पार्टी को नए सिरे से सारी कवायद करना होगी।

पार्टी ही महत्वपूर्ण

उत्तरप्रदेश में मिली ऐतिहासिक जीत के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा पार्टी से ऊपर हो गया है। भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी मोदी के करिश्माई नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है। मोदी हर कदम संघ की विचारधारा से प्रेरित होकर उठा रहे हैं। चाहे वह तीन तलाक का मुद्दा हो या फिर बाबरी मस्जिद का। कश्मीर का मसला मोदी और संघ की प्राथमिकता में अभी नजर नहीं आ रहा है। बाबरी और तीन तलाक का मामला बगैर किसी झंझट के सुलझ गया फिर बारी कश्मीर में एक निशान की आएगी। इसके लिए 2019 में दो तिहाई बहुमत के साथ मोदी के नेतृत्व में सरकार बनना जरूरी है। पार्टी यह मान रही है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जो सीटें मिली थीं, उनमें कुछ बदलाव आ सकता है। उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ सिंह की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होगी।

 

योगी का हर कदम 2019 के चुनाव के हिसाब से आगे बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश में पूरी चालीस सीटों का लक्ष्य पार्टी ने तय किया है। कमलनाथ, कांतिलाल भूरिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने की कवायद इसी दिशा में उठाया गया कदम है। अगली बार, मोदी सरकार के लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह देश व्यापी दौरे कर रहे हैं। इन दौरों से मिले फीड बैक के आधार पर ही राज्यों में नेतृत्व तय होना है। चेहरे ऐसे होंगे, जो कार्यकर्ताओं को पसंद हो। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने कार्यकर्ताओं के साथ टिफिन भोज का आयोजन दो कारणों से किया है। पहला कारण तो यह है कि अमित शाह जब प्रदेश में पहुंचे तो कार्यकर्ता उपेक्षा की शिकायत न करें। दूसरा कारण नेतृत्व को यह संदेश देना है कि बारह साल बाद भी शिवराज सिंह चौहान की मैदानी पकड़ बरकरार है।

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