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बदल रही है भाजपा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नीत सरकार का थीम सांग ‘देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा’ कि तर्ज पर भारतीय जनता पार्टी भी अपना चाल, चरित्र और चेहरा बदल रही है। पार्टी को पहचान देने और स्थापित करने वाला राम मंदिर का मुद्दा सैकड़ों मील पीछे छूटा हुआ नजर आ रहा है। उत्तरप्रदेश में अगले साल चुनाव होना है, इस कारण यदा-कदा राष्ट्रीय स्वयं सेवक के संगठन विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं की प्रतिक्रिया सुनने को जरूर मिल जाती है। यूपीए सरकार के दौर को याद करिए विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया मंदिर के मुद्दे पर दहाड़ते हुए नजर आते थे। तोगड़िया खामोश हैं। उनकी खामोशी की वजह संघ की संगठनात्मक व्यवस्था भी हो सकती है। अशोक सिंघल अब रहे नहीं। कोई ऐसा चेहरा सामने नहीं है, जिसकी पहचान राम मंदिर से जुड़ी हो। भारतीय जनता पार्टी देश में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में है। राज्यसभा में भी अब उसकी उपस्थिति असहाय सरकार की नहीं है। लेकिन सरकार की मंशा राम मंदिर के वचन को पूरा करने की दिखाई नहीं देती है। वैसे भी नरेन्द्र मोदी धर्म और जाति के आधार पर वोट मांग कर देश के प्रधानमंत्री नहीं बने हैं। देश की जनता ने विकास के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया था। पार्टी को दिए गए वोट के आधार पर नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। भारतीय जनता पार्टी की घोषित नीति हिन्दुत्व की है। हिन्दुत्व के एजेंडे के तले पार्टी ने जाति को अलग करके नहीं देखा। दलित-आदिवासी और सामान्य के बीच कोई फर्क नहीं किया। पार्टी यह मानती रही है कि हिन्दु धर्म में वे सारी जातियां आती हैं, जो भगवान को मानती है। भले ही उनके आराध्य कोई भी हों? वो ही हिन्दू नहीं हैं, जो अल्ला और गॉड को मानता है। सिख धर्म को भारतीय जनता पार्टी हिन्दू धर्म का ही एक अंग मानती रही है। देश में जब भी भाजपा अल्पसंख्यक की बात करती है तो उसका निशाना मुस्लिम और ईसाई ही होते हैं। उत्तरप्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होना है और नरेन्द्र मोदी के लिए यह समय अपनी सर्वस्वीकार्यता को स्वीकार कराने का है।

 

वैसे देश गोधरा कांड के बाद भी वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें स्वीकार कर चुका है। लेकिन दिल्ली से लेकर बिहार तक और पश्चिम बंगाल ने जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को नकारा, उसके चलते अब चाल, चरित्र और चेहरा बदलने की कवायद चल रही है। इस कवायद के केन्द्र में है दलित। दलितों के बीच भारतीय जनता पार्टी की पहचान मनुवादी पार्टी के तौर पर रही है। दलितों के पास भाजपा को मनुवादी मानने के तर्क भी हैं। भारतीय जनता पार्टी का जन्म राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से हुआ है। संघ की रीति-नीति हमेशा ही उच्च वर्ग या यूं कहें मराठी के हाथ में रही है। दलितों को आगे लाने के जो आंदोलन देश के विभिन्न राज्यों में चले उनमें महाराष्ट्र वो जगह है, जहां लड़ाई लंबी चली। संघ का मुख्यालय भी संयोग से महाराष्ट्र के ही नागपुर में है। नागपुर से ही संघ और दलित के बीच जो फासला शुरू हुआ वो बढ़ता ही चला गया। इसी फासले को ही कम करने के लिए भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बाबा साहब अंबेडकर को भगवा रंग में रंगने की कोशिश कर रहे हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि बाबा साहब के जवाहर लाल नेहरू से मतभेद थे। इन मतभेदों के बाद भी दलित के
बड़े वर्ग ने कांगे्रस को सालों तक सत्ता में रखा। दलित वर्ग जब भी कांगे्रस से दूर हुआ, पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। उत्तरप्रदेश में पार्टी एक बार सत्ता से बाहर हुई तो फिर वापस आ नहीं सकी। यही स्थिति बिहार की रही। अब मध्यप्रदेश में भी उत्तरप्रदेश जैसे हालात बनते जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी इन हालातों को देख रही और समझ रही है। पार्टी की दुविधा यह है कि वो यदि दलितों के साथ जाती है, तो घमासान पार्टी के अंदर ही मचेगा। ऊंची जाति के लोग इस राजनीति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। आरक्षण की व्यवस्था के बारे में संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान संघ में ऊंची जाति के दबदबे का ही परिणाम था। बिहार के बाद नए सिरे से सोच और समझने का दौर शुरू हुआ है। जिस तरह से मायावती ने नौ साल पहले ऊंची जाति खासकर ब्राहम्णों को साथ रखकर 2007 में सत्ता हासिल की थी, कुछ उसी तरह का समीकरण बनाने की कोशिश में भाजपा लगी हुई है। भारतीय जनता पार्टी में समस्या ब्राहम्णों को लेकर ही है। दलित और ठाकुर राजनीति के चलते ब्राहम्णों को हिन्दी भाषी राज्यों में पूरी तरह से हाशिए पर डाल दिया गया है। उम्रदराज ब्राहम्ण नेता अप्रासंगिक हो गए हैं और नया नेतृत्व उभर नहीं पाया है। उत्तरप्रदेश में नब्बे के दशक में ओबीसी राजनीति का दौर चला था। कल्याण सिंह उस दौर के नायक थे। कल्याण को अपनी सत्ता राम मंदिर के मुद्दे के कारण ही गंवाना पड़ी थी। बाद के सालों में मायावती से साझे
दारी कर सत्ता बनाने की कोशिश हुई। मायावती से तालमेल की कोशिश सफल नहीं हो पाई।

 

उत्तर प्रदेश में ब्राहम्ण वोट की अहमियत कांगे्रस भी जानती है। इस कारण ही नारायण दत्त तिवारी लंबे समय तक सत्ता में बने रहे। दौर बदल रहा है। चेहरा भी बदल रहा और चाल भी बदली है। नरेन्द्र मोदी राम मंदिर के साथ-साथ विकास के मुद्दे को भी पीछे छोड़ आए हैं। अब वे सिर्फ दलित राजनीति का ही पोषण कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दलितों के बीच जा रहे हैं और उनके घर खाना खा रहे हैं। राजनीति में इस तरह की कोशिश पहले भी राजनीतिक दल करते आए हैं। इस तरह की कोशिश से चुनाव में कोई खास फायदा होता नहीं है। उज्जैन में हुए सिंहस्थ में दलित स्नान के आयोजन का सबसे ज्यादा विरोध भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही हुआ। इस विरोध के कारण ही दलित स्नान का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था। समस्या यह है कि भारतीय जनता पार्टी के पास कोई ऐसा दलित चेहरा ही नहीं है, जिसे सामने रखकर वो मायावती की राजनीति का जवाब दे सके। यह स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं राज्य के स्तरों पर भी है। पार्टी का नेतृत्व या तो ऊंची जाति के लोगों के हाथों में है अथवा पिछड़ा वर्ग से आए लोगों के हाथों में। उत्तरप्रदेश में पिछड़ों के सबसे बड़े नेता के तौर पर मुलायम सिंह यादव की अलग पहचान है। समाजवादी पार्टी यादव और मुस्लिम का समीकरण बनाकर चुनाव जीतने की कोशिश कर रही है। दलित यदि भाजपा के साथ जाता है तो मुश्किल मायावती की होगी। अमित शाह, मायावती को कमजोर करने के लिए ही बसपा के नेताओं को भाजपा में शामिल कराने में लगे हुए हैं।

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