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एक बेबस मुख्यमंत्री और बेलगाम नौकरशाही मध्यप्रदेश में बेलगाम नौकरशाही की चर्चा पहली बार नहीं की जा रही है। राज्य में नौकरशाही चुने हुए प्रतिनिधियों के नियंत
एक बेबस मुख्यमंत्री और बेलगाम नौकरशाही मध्यप्रदेश में बेलगाम नौकरशाही की चर्चा पहली बार नहीं की जा रही है। राज्य में नौकरशाही चुने हुए प्रतिनिधियों के नियंत

एक बेबस मुख्यमंत्री और बेलगाम नौकरशाही

दिनेश गुप्ता : पावर गैलरी- एक बेबस मुख्यमंत्री और बेलगाम नौकरशाही

एक बेबस मुख्यमंत्री और बेलगाम नौकरशाही मध्यप्रदेश में बेलगाम नौकरशाही की चर्चा पहली बार नहीं की जा रही है। राज्य में नौकरशाही चुने हुए प्रतिनिधियों के नियंत

मध्यप्रदेश में बेलगाम नौकरशाही की चर्चा पहली बार नहीं की जा रही है। राज्य में नौकरशाही चुने हुए प्रतिनिधियों के नियंत्रण से बाहर है, इसकी शिकायत हर आम और खास आदमी पिछले तीन साल से लगातार करता आ रहा है। हम यहां सिर्फ तीन साल का जिक्र इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि शिवराज सिंह चौहान ने तीन साल पहले ही राज्य में लगातार तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी को सरकार में लाने का श्रेय प्राप्त किया था।लगातार तीसरी बार शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य की जनता में यह आस बंधी थी कि अब कोई अफसर अपनी मनमर्जी नहीं चला पाएगा। पहली बार राज्य में ऐसा हुआ कि किसी व्यक्ति को आम चुनाव में जीत हासिल करने के बाद लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला हो। लगातार तीसरी बार सत्ता की कमान संभालने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से हो जाती है कि अब राम राज्य स्थापित हो जाएगा। राजनीति में यदि कोई व्यक्ति बिना किसी अंतराल के लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बनता है तो यह धारणा भी स्वाभाविक तौर पर बन जाती है कि वह अब अंगद का पांव हो चुका है अथवा उसके समक्ष कोई राजनीतिक चुनौती नहीं है। पार्टी के भीतर भी उस पर दबाव नहीं डाला जा सकता।

किसकी जिम्मेदारी ?

गुरुवार को भोपाल में सिविल सर्विस-डे पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस तरह से राज्य की नौकरशाही की व्याख्या की उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन ”बिगड़े नौकरशाहों” को रास्ते पर लाने की जिम्मेदारी किसकी है? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अथवा राज्य के मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जिक्र महज इसलिए किया जा रहा है क्योंकि आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों की ह्यमाई-बापह्ण केन्द्र सरकार है।  राज्य यदि किसी नौकरशाह के खिलाफ कभी सख्त कदम उठाने की सोचती है तो केन्द्र सरकार उसकी सिफारिश को आसानी से नहीं मानती (वैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले ग्यारह साल में आईएएस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही नहीं की, अधिकारियों का निलंबन वक्त की मांग को देखकर रस्मी तौर पर किया जाता है।) सिविल सर्विस-डे पर मुख्यमंत्री ने अधिकारियों का जो चाल, चरित्र और चेहरा बयां किया है, उसे गढ़ने में शिवराज सिंह की भूमिका से किसी को इंकार भी नहीं होता है। गली-गली में नौकरशाहों के बिगड़ने के किस्से सुने जा सकते हैं। बसंत प्रताप सिंह और उनसे पहले जितने भी मुख्य सचिव रहे किसी ने भी चुनी हुई सरकार की रीति-नीति और भावनाओं के अनुरूप अफसरों से काम करने के लिए दबाव नहीं डाला। सरकार के एजेंडे से हटकर अधिकारी अपनी व्यक्तिगत वाहवाही के लिए प्रचार के नए-नए तरीके खोजते रहे। इन तरीकों को अनुकरणीय पहल के तौर पर प्रचारित करने में भी अफसरों को कोई गुरेज नहीं होती। अफसरों के मामले में सरकार के निर्णय कई बार विरोधाभाषी रूप में सामने आए। अजय गंगवार को देश के पहले प्रधानमंत्री की तारीफ करने के कारण कलेक्टरी से हटा दिया जाता है तो दीपाली रस्तोगी को तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वाकांक्षी नीति पर सवाल उठाने के कारण रेवेन्यू बोर्ड नहीं भेजा जाता है। रेवेन्यू बोर्ड लूप लाइन है, यह बात मुख्यमंत्री को समझ में आ चुकी है। वे कई बार रेवेन्यू बोर्ड में तैनात अफसरों के तौर तरीकों पर सवाल उठा चुके हैं। मुख्यमंत्री को लगता है कि रेवेन्यू बोर्ड लूपलाइन नहीं है तो  फिर उन्होंने कभी बसंत प्रताप सिंह, एसआर मोहंती, एपी श्रीवास्तव और राधेश्याम जुलानिया जैसे अफसरों को वहां पदस्थ क्यों नहीं किया? ये अफसर वहां पदस्थ होते तो शायद सरकारी जमीन निजी नहीं हो पाती।
राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था बिगड़ी हुई है। यह बात अब मुख्यमंत्री खुद सार्वजनिक तौर बयान कर रहे हैं। राज्य में हर तरफ प्रशासनिक अराजकता का माहौल है। प्रशासन में अराजकता के लिए दो लोग सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव। कितनी अजीब स्थिति है, जिसे सुशासन स्थापित करना है, वही अराजकता का रोना रो रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास न मंत्रियों से बात करने का समय है और न ही अफसरों की खाट खड़ी करने का। मंत्रियों से उनका सीधा संवाद सिर्फ कैबिनेट की बैठक में ही होता है। मंत्री यदि अलग से मुख्यमंत्री से अपने विभाग के बारे में बात करना चाहे तो उन्हें महीनों इंतजार करना पड़ता है। मंत्रिमंडल में शायद ही कोई ऐसा मंत्री होगा, जिसके लिए सारी स्थितियां अनकूल हो। पटवारी हड़ताल पर हैं। पंचायत सचिव हड़ताल पर हैं। इनके बगैर भी ग्रामोदय अभियान चल रहा है। जाहिर है कि अफसर हर कला में पारंगत हैं। कागजों पर उनके दौरे भी दिखाई देंगे और समस्याएं भी वे निपटा चुके होंगे। जब मुख्यमंत्री अभियान की समीक्षा करेंगे तो बताया जाएगा कि पूरे प्रदेश में राम राज्य स्थापित हो चुका है। अश्वमेघ यज्ञ की सलाह भी अफसर दे दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अराजकता भरे इस राज्य में मुख्य सचिव की भूमिका आखिर क्या है? क्या सिर्फ मंत्रालय में बैठक करने से ही उनकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? प्रदेश में राम राज्य ऐसा है कि अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग बसंत प्रताप सिंह को मुख्य सचिव ही नहीं मानता। ऐसे अफसरों की ताकत इतनी है कि वे मुख्य सचिव के निर्देशों को भी पढ़ना जरूरी नहीं समझते। ये वो अफसर हैं जिनका एक पैर मुख्यमंत्री सचिवालय में होता है तो दूसरा उस कमाऊ विभाग में जिसकी अतिरिक्त जिम्मेदारी उन्होंने हथिया ली है। जो अफसर मुख्यमंत्री सचिवलाय में पदस्थ हो वो क्या अन्य विभाग की जिम्मेदारी निभाते वक्त विभागीय मंत्री को तरजीह देगा? मुख्यमंत्री भी इन अफसरों के खिलाफ अपने मंत्रियों की भी बात नहीं सुनना चाहते। विपक्ष मुक्त राज्य ह्यटका सैर भाजी, टका सेर खाजाह्ण की कहावत को चरित्रार्थ करता है। मंत्रियों में असंतोष बढ़ता है तो अफसर मुख्यमंत्री से विभागों की समीक्षा का कार्यक्रम तैयार कर देते हैं। जिस गलती के लिए अफसरों के खिलाफ कार्यवाही होना चाहिए उस गलती के लिए मंत्रियों को नसीहत दी जाती है। पचमढ़ी की समीक्षा बैठक को लोग भूले नहीं होंगे। क्या मुख्यमंत्री ने किसी भी अफसर के खिलाफ कोई कार्यवाही की? सांसद, विधायक सभी ने नौकरशाही के रवैये की आलोचना की थी। शिवपुरी में तो जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी युवा आईएएस अफसर नेहा मारव्या ने मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया को उद्घाटन कार्यक्रम करने से ही रोक दिया था। मुख्यमंत्री ने उफ तक नहीं की। कई कलेक्टर तो जिले में दौरे पर आए प्रभारी मंत्री से मिलने भी नहीं जाते। मुख्यमंत्री नौकरशाही के आगे बेबस हैं, ऐसे में अफसरों को निर्वाचन क्षेत्र में रहकर इज्जत बचाना बेहतर लगता है।